स्वार्थवत सियासी शंखनाथ में सफर करती आस्थाऐं वैचारिक संगठन से इतर सिपहसालारी को संघर्ष करते सिपहसालार

वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
आज जिस तरह से भारतीय राजनीति का सियासत में नया खाका खिच रहा है उसके भावी परिणाम भले ही भविष्य के गर्व में हो। मगर भविष्य की सियासत पर नजर डाले तो इतना तो तय है कि अब भारतीय सियासत सटीक विसात पकड चुकी है। जिसमें दूध का दूध और पानी का पानी होना तय है। देखा जाए तो जो संगठन आज निःस्वार्थ भाव से सेवा कल्याण और राष्ट्रीय सामर्थ के भाव को लेकर आगे बढ रहे है निश्चित ही उनके कारवां पर उंगली उठाना सूर्य को रोशनी दिखाने के समान है। शेष संगठनों के वैचारिक और व्यक्तिगत आधारों की समीक्षा करें, तो एक भी ऐसा सियासी दल या संगठन उनके सामर्थ के आगे समर्थ दिखाई नहीं पडता। ऐसे में स्वार्थवत और सिपहसालारी या अपनी-अपनी लोकतंत्र में वैचारिक सामंती को बचाने जिस तरह से नैतिक सिद्धान्त और स्वीकार्य व्यवहार की अनदेखी कर सेवा कल्याण के नाम शंखनाथ हो रहा है उससे इतना तो तय है कि उन्हें वैचारिक सिपहसालारी सामंती अवश्य तत्कालिक रूप से मिल जाये। मगर स्थापित सियासी आधार के विरूद्ध उनका अपना मूल आधार बचाना उन्हें मुश्किल ही नहीं नमुमकिन होगा। मगर कहते है कि जो अपने स्वार्थो के लिए अपने कत्र्तव्य निर्वहन को अपना पुरूषार्थ मानते है। उन्हें कुछ समय की राहत तो मिल सकती है जो उनका आधार हो सकता है। मगर उन्हें सर्वांगीण सफलता मिलें यह सवाल वह खुद ही सोच सकते है। जिस तरह से कांग्रेस जैसे वृहत संगठन का क्षरण हुआ या होता जा रहा है वह निश्चित ही उस वैचारिक आधार और उसकी संगठनात्मक क्षमता के साथ नेतृत्व पर सवाल है जो उसके पुरूषार्थ के रूप में उसके सामने है और इस क्रम का रूक पाना फिलहाल असंभव ही नहीं नमुमकिन लगता है। क्योंकि कोई भी वैचारिक आधार तभी तक जिन्दा रह सकता है जब तक कि वह लोगों में आत्मिक आस्था का विषय और अपने पुरूषार्थ की सिद्धता सिद्ध करने में सफल रहे। जो आज उससे कोसो दूर नजर आते है, तो दूसरी ओर वह वैचारिक संगठन है जो अपने विचार की जीवंता के चलते आस्था का विषय भी बन रहा है और अपने पुरूषार्थ की प्रमाणिकता को सिद्ध करने में ही सफल हो रहा है। म.प्र. के बाद राजस्थान और फिर म.प्र. सियासी जगत में कोई नई बात नहीं होगी। क्योंकि यह स्वभाविक भी है और स्वीकार्य योग्य भी है जिसे सियासी तौर पर निहित स्वार्थो के चलते नकारा भी नहीं जा सकता।

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