अनमोल अवसर, मगर बेडागरग हो थारा.........तीरंदाज ?
व्ही.एस.भुल्ले
भैया- कंडे पडे म्हारे इस कोरोनाकाल पर और कालिख पुते इस कोविड-19 पर मने कै पता था कि कोरोनाकाल में जन्म लेने से पूर्व ही म्हारी चुनाव चंदा स्वयंभू चिन्दी पार्टी की धरना प्रदर्शन सियासी तोडफोड गठजोड, वर्चुअल रैली और अघोषित तौर पर कारगार गठित अनुवांशिक संघीय संगठन नेताओं की महत्वकांक्षा के चलते इस कलयुग में जन्म लेने से पूर्व ही उसकी भ्रूण हत्या हो जायेगी और म्हारी काठी एक मर्तवा फिर से निढाल हो निठल्ली साबित हो जायेगी। काडू बोल्या कि सृष्टि में मानव जीवन, जीवन का अमूल्य अनमोल अवसर होता है। मगर मने न लागे कि कलयुग में ऐसा कोई मौल-तौल मानव जीवन का अब बचा है।
भैये- मुंए चुपकर तू कै जाने मानव जीवन का मूल्य और भ्रूण हत्या जैसे महापाप का अर्थ अगर आध्यात्म की माने तो जो सजा भ्रूण हत्या के प्रयास पर अश्वतथामा को प्रभु कृष्ण ने दी थी जो अपराध अश्वतथामा ने अभिमन्यु के पुत्र को गर्भ में ही मारने चलाये अस्त्र के रूप में किया था उस अपराध की सजा सुदर्शन चक्र से सर धड से अलग से कर मृत्युदण्ड के रूप में दे सकते थे। मगर अपराध की जघन्यता को देखते हुए प्रभु कृष्ण ने उसके माथे पर लगी मणी को छीन मणी के घाव के साथ युगो-युगो तक उसे जिन्दा रहने छोड दिया। क्योंकि अश्वतथामा ने भ्रूण हत्या का प्रयास कर स्वयं सृजनकर्ता को सीधी चुनौती दी थी और सृष्टि के विधान के विरूद्ध अहंकार बस अपना सामर्थ दिखाने का असफल प्रयास किया था।
अगर थारे को आध्यात्म में आस्था न हो और कलयुग में विश्वास है तो मानव का मोल जो कोरोनाकाल में बढा है और जिसने मानव मोल के पुराने सारे रिकार्ड तोड, करोडो तक की कीमत तक जा पहुंचा है वह किससे छिपा है। कर्नाटक से लेकर म.प्र. और अब राजस्थान में भी सत्ता के संेसेक्स का आंकडा सारे रिकार्ड तोड रहा है। देखा नहीं कि सेंसेक्स की ऊंचाई देख म्हारे भरे पूरे गहलोत का भी गला सूख रहा है।
भैया- आखिर तू कहना कै चावे, कै मने बावला शै, मगर तने भी कान खोलकर सुन ले, मानेसर या कर्नाटक सहित म.प्र. के विषधरों की मने कोणी बात कर रहा हूं, न ही मने खुलते बाजार माननीयों का भाव-ताव पूछ रहा हूं। अगर दुकान सजी है और खरीददार मौजूद है तो बाजार तो सजेगा ही, फिर वह सियासी बाजार हो या म्हारा ऐतिहासिक मीना बाजार, बाजार तो होते ही खरीद-फरोक्त के लिए फिर बैसे भी आजकल जमाना भी ग्लोबल है, सो बाजार में क्या और कौन किस भाव बिच खरीद रहा है म्हारे को कै लेना-देना मने तो दुख मातम म्हारी चुनाव चंदा चिन्दी पार्टी को लेकर है और गम जीवन के अनमोल अवसर को गंवाने को लेकर है। सुना है ऊपर वाले ने म्हारे जैसे नंगे-भूखे आभावों में रह अद-पेट सोने वालों की चींख-पुकार दमघोटू रूदन को आये दिन सुन कोरोना महान की अब दिशा पलट ली है सो अब धीरे-धीरे कोरोना का रूक गरीब, गंदी बस्तियों से निकल मायानगरी में कुबेरों की बस्ती की ओर हो लिया है और माननीय श्रीमान माई-बापों को अब अपने आगोश में ले रहा है। आखिर सच क्या है ?
भैये- कै थारे को मालूम कोणी श्रावण मास है और बाबा भोलेनाथ का दरबार चल रहा है, सो हाथों हाथ उन लोगों का भी हिसाब किताब हो रहा है जिनकी आस्था, आध्यात्म या जिनकी आस्था धन और विज्ञान में रही है। जिसकी जैसी आस्था उसकों बैसा न्याय, फिलहाल बाबा के दरबार में मिल रहा है। सच बोल्यू तो तने भी भगवान भोलेनाथ में ध्यान लगा और मौका लगे तो थारी चुनाव, चंदा चिन्दी पार्टी की अर्जी हाथों-हाथ लगा, उतने पर थारी पार्टी चल जायेगी बरना अघोषित अनुवांशिक संघीय संगठनों के टापोतले थारी चुनाव चंदा चिन्दी पार्टी की भी घिग्गी बंद हो जायेगी।
भैया- मने समझ लिया थारा इसारा ऐसे सियासी तूफान में जब बडे-बडे बुर्ज हिल रहे है और बडे-बडे महल जमीदोज हो पुराने से पुराने दरक पेड उखड रहे है तथा सियासी मैदान में अच्छे-अच्छे धन बाहुबलियों के पसीने छूट रहे है ऐसे में मने तो पानी पी-पी कर एक दूसरे को कोसने वाले हापनी भरते उन सियासी मुस्थंडो पर दया आवे, जो अपने उखडते निजाम के अंतिम दिन देख ऐडी चोटी का संघर्ष कर, हर कीमत पर निजाम बचाने या बढाने में लगे है। फिर भाया सियासत का क्या, ये तो बैसे भी कभी किसी की न हुई। अब तो सियासत में सरेयाम करोडो अरबों के दांव सेवा कल्याण के नाम लग रहे है और संवैधानिक आस्था और धर्म के नारे स्वार्थो के लिए सडक से लेकर लोकतंत्र की संस्थाओं तक बुलंद हो रहे है। मगर मने न लागे कि कोरोना मुक्त हो रही सियासत पर कोरोना महान का कोई फर्क पडने वाला है। फिलहाल मने तो घर में ही राम उत्सव मनाने की तैयारी में जुटा हूं और हर मानव को कोरोना मान निष्ठापूर्ण ढंग से मास्क लगा हाथ धोकर सोशल डिस्टेंस का पालन कर रहा हूं। सो मने तो बोल्यू तने पहले अपने हाथ धो आ फिर म्हारे हाथों को थोडी दूरी बना गंगा सागर से धुला इतने पर तो थारी और म्हारी काठी इस मंुये कोरोना से बच जायेगी, बरना कोरोना का क्या वह तो अब हरफनमौला हो चुका है और विश्व में संक्रमितों का आंकडा डेढ करोड तो म्हारे महान भूभाग पर लाखों के पार जा पहुंचा है। अब तो उसकी पकड में, सच बोल्यू तो भाया गली, मौहल्ले, झोपडपट्टी ही नहीं महल, सिंहासनों तक जा पहुंची है जिसकी जकड से न तो म्हारे माई-बाप माननीय श्रीमना बच रहे है और न ही सडकों पर बगैर मास्क बगैर किसी काम के घूमते लोग संक्रमण बांटने वाले चूक रहे है। सो मने तो बोल्यू कि 5 अगस्त को प्रभु श्रीराम की जन्मस्थली पर जो भूमिपूजन होने वाला है और राम-नाम का जयकारा समूचे ब्राहांण्ड में गूंचने वाला है तो भैया उसी के साथ हो लूं और अपनी पीढियों के कर्ज को उतार इस मृत्यु लोक से अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करते हुए मुक्त हो लूं। बोल भैया कैसी रही।
जय स्वराज
भैया- कंडे पडे म्हारे इस कोरोनाकाल पर और कालिख पुते इस कोविड-19 पर मने कै पता था कि कोरोनाकाल में जन्म लेने से पूर्व ही म्हारी चुनाव चंदा स्वयंभू चिन्दी पार्टी की धरना प्रदर्शन सियासी तोडफोड गठजोड, वर्चुअल रैली और अघोषित तौर पर कारगार गठित अनुवांशिक संघीय संगठन नेताओं की महत्वकांक्षा के चलते इस कलयुग में जन्म लेने से पूर्व ही उसकी भ्रूण हत्या हो जायेगी और म्हारी काठी एक मर्तवा फिर से निढाल हो निठल्ली साबित हो जायेगी। काडू बोल्या कि सृष्टि में मानव जीवन, जीवन का अमूल्य अनमोल अवसर होता है। मगर मने न लागे कि कलयुग में ऐसा कोई मौल-तौल मानव जीवन का अब बचा है। भैये- मुंए चुपकर तू कै जाने मानव जीवन का मूल्य और भ्रूण हत्या जैसे महापाप का अर्थ अगर आध्यात्म की माने तो जो सजा भ्रूण हत्या के प्रयास पर अश्वतथामा को प्रभु कृष्ण ने दी थी जो अपराध अश्वतथामा ने अभिमन्यु के पुत्र को गर्भ में ही मारने चलाये अस्त्र के रूप में किया था उस अपराध की सजा सुदर्शन चक्र से सर धड से अलग से कर मृत्युदण्ड के रूप में दे सकते थे। मगर अपराध की जघन्यता को देखते हुए प्रभु कृष्ण ने उसके माथे पर लगी मणी को छीन मणी के घाव के साथ युगो-युगो तक उसे जिन्दा रहने छोड दिया। क्योंकि अश्वतथामा ने भ्रूण हत्या का प्रयास कर स्वयं सृजनकर्ता को सीधी चुनौती दी थी और सृष्टि के विधान के विरूद्ध अहंकार बस अपना सामर्थ दिखाने का असफल प्रयास किया था।
अगर थारे को आध्यात्म में आस्था न हो और कलयुग में विश्वास है तो मानव का मोल जो कोरोनाकाल में बढा है और जिसने मानव मोल के पुराने सारे रिकार्ड तोड, करोडो तक की कीमत तक जा पहुंचा है वह किससे छिपा है। कर्नाटक से लेकर म.प्र. और अब राजस्थान में भी सत्ता के संेसेक्स का आंकडा सारे रिकार्ड तोड रहा है। देखा नहीं कि सेंसेक्स की ऊंचाई देख म्हारे भरे पूरे गहलोत का भी गला सूख रहा है।
भैया- आखिर तू कहना कै चावे, कै मने बावला शै, मगर तने भी कान खोलकर सुन ले, मानेसर या कर्नाटक सहित म.प्र. के विषधरों की मने कोणी बात कर रहा हूं, न ही मने खुलते बाजार माननीयों का भाव-ताव पूछ रहा हूं। अगर दुकान सजी है और खरीददार मौजूद है तो बाजार तो सजेगा ही, फिर वह सियासी बाजार हो या म्हारा ऐतिहासिक मीना बाजार, बाजार तो होते ही खरीद-फरोक्त के लिए फिर बैसे भी आजकल जमाना भी ग्लोबल है, सो बाजार में क्या और कौन किस भाव बिच खरीद रहा है म्हारे को कै लेना-देना मने तो दुख मातम म्हारी चुनाव चंदा चिन्दी पार्टी को लेकर है और गम जीवन के अनमोल अवसर को गंवाने को लेकर है। सुना है ऊपर वाले ने म्हारे जैसे नंगे-भूखे आभावों में रह अद-पेट सोने वालों की चींख-पुकार दमघोटू रूदन को आये दिन सुन कोरोना महान की अब दिशा पलट ली है सो अब धीरे-धीरे कोरोना का रूक गरीब, गंदी बस्तियों से निकल मायानगरी में कुबेरों की बस्ती की ओर हो लिया है और माननीय श्रीमान माई-बापों को अब अपने आगोश में ले रहा है। आखिर सच क्या है ?
भैये- कै थारे को मालूम कोणी श्रावण मास है और बाबा भोलेनाथ का दरबार चल रहा है, सो हाथों हाथ उन लोगों का भी हिसाब किताब हो रहा है जिनकी आस्था, आध्यात्म या जिनकी आस्था धन और विज्ञान में रही है। जिसकी जैसी आस्था उसकों बैसा न्याय, फिलहाल बाबा के दरबार में मिल रहा है। सच बोल्यू तो तने भी भगवान भोलेनाथ में ध्यान लगा और मौका लगे तो थारी चुनाव, चंदा चिन्दी पार्टी की अर्जी हाथों-हाथ लगा, उतने पर थारी पार्टी चल जायेगी बरना अघोषित अनुवांशिक संघीय संगठनों के टापोतले थारी चुनाव चंदा चिन्दी पार्टी की भी घिग्गी बंद हो जायेगी।
भैया- मने समझ लिया थारा इसारा ऐसे सियासी तूफान में जब बडे-बडे बुर्ज हिल रहे है और बडे-बडे महल जमीदोज हो पुराने से पुराने दरक पेड उखड रहे है तथा सियासी मैदान में अच्छे-अच्छे धन बाहुबलियों के पसीने छूट रहे है ऐसे में मने तो पानी पी-पी कर एक दूसरे को कोसने वाले हापनी भरते उन सियासी मुस्थंडो पर दया आवे, जो अपने उखडते निजाम के अंतिम दिन देख ऐडी चोटी का संघर्ष कर, हर कीमत पर निजाम बचाने या बढाने में लगे है। फिर भाया सियासत का क्या, ये तो बैसे भी कभी किसी की न हुई। अब तो सियासत में सरेयाम करोडो अरबों के दांव सेवा कल्याण के नाम लग रहे है और संवैधानिक आस्था और धर्म के नारे स्वार्थो के लिए सडक से लेकर लोकतंत्र की संस्थाओं तक बुलंद हो रहे है। मगर मने न लागे कि कोरोना मुक्त हो रही सियासत पर कोरोना महान का कोई फर्क पडने वाला है। फिलहाल मने तो घर में ही राम उत्सव मनाने की तैयारी में जुटा हूं और हर मानव को कोरोना मान निष्ठापूर्ण ढंग से मास्क लगा हाथ धोकर सोशल डिस्टेंस का पालन कर रहा हूं। सो मने तो बोल्यू तने पहले अपने हाथ धो आ फिर म्हारे हाथों को थोडी दूरी बना गंगा सागर से धुला इतने पर तो थारी और म्हारी काठी इस मंुये कोरोना से बच जायेगी, बरना कोरोना का क्या वह तो अब हरफनमौला हो चुका है और विश्व में संक्रमितों का आंकडा डेढ करोड तो म्हारे महान भूभाग पर लाखों के पार जा पहुंचा है। अब तो उसकी पकड में, सच बोल्यू तो भाया गली, मौहल्ले, झोपडपट्टी ही नहीं महल, सिंहासनों तक जा पहुंची है जिसकी जकड से न तो म्हारे माई-बाप माननीय श्रीमना बच रहे है और न ही सडकों पर बगैर मास्क बगैर किसी काम के घूमते लोग संक्रमण बांटने वाले चूक रहे है। सो मने तो बोल्यू कि 5 अगस्त को प्रभु श्रीराम की जन्मस्थली पर जो भूमिपूजन होने वाला है और राम-नाम का जयकारा समूचे ब्राहांण्ड में गूंचने वाला है तो भैया उसी के साथ हो लूं और अपनी पीढियों के कर्ज को उतार इस मृत्यु लोक से अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करते हुए मुक्त हो लूं। बोल भैया कैसी रही।
जय स्वराज
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