लोकतंत्र का माखौल उडाते भाई लोग हदप्रद जनता यह समझने तैयार नहीं कि यह सेवा कल्याण है या स्वार्थ और स्व-कल्याण

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह के हालात सत्ता, सरकार और संस्थाओं को लेकर लोगों के सामने है उन्हें देख आम जनता भी अब भ्रम की स्थिति में नजर आती है। सवाल कई है मगर जिस सवाल की चर्चा इस कोरोनाकाल में आम है वह यह है कि जो निष्ठा और कत्र्तव्य निर्वहन के एक से बढकर एक र्कीतिमान सेवा कल्याण और विकास के नाम स्थापित हो रहे है वह वाक्य में ही सेवा कल्याण है या स्वार्थवत स्व-कल्याण। अगर चर्चाओं की माने तो लोग अब तो यह कहने से भी नहीं चूक रहे कि जब मोटी-मोटी पगार और मनमाफिक वेतन भत्ते हासिल कर मनमानी पर उतारू माननीयों के निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के नाम यह हाल है तो कैसे होगी सेवा और कौन करेगा कल्याण। बैसे भी अभी हालिया बेचारे एक सम्मानीय संपादक महोदय के लेख में कहा गया है कि सरकारों की आय का 90 फीसद धन तो सिर्फ व्यवस्थायें जुटाने बनाने में खर्च हो जाता है और 10 फीसदी विकास के नाम बच पाता है इसमें भी भ्रष्ट लोगों की छीना-झपटी के लिए आपसी मारामारी तो ऐसे में सेवा कल्याण की कल्पना ही बैमानी हो जाती है। देखना होगा कि आम जनता कब अपने हुकूब और माली हालत पर संज्ञान लेगी यह देखने वाली बात होगी। 

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