बिगडे ढर्रे पर सुधार की कोशिश सांसत में शहरवासी
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
शिवपुरी। जिस उत्साह के साथ शिवपुरी में कोरोना के खिलाफ जंग शुरू हुई थी चार माह गुजरते ही अब वह चारोखाने चित दिखाई पडती है। कोरोना के कोहराम ने विगत चार माह से सिर्फ कोरोना ही नहीं शेष अन्य बीमारियों से जूझते लोगों का जहां जीवन नरक बना दिया, तो वहीं दूसरी ओर रोजमर्रा की मजदूरी कर पेट भरने वाले या मध्यम दर्जे के व्यवसाय करने वालों को खून के आंसू रूलाने छोड दिया है। अब जबकि यह बीमारी और संक्रमणकाल के रूप में इस मौसम को जाना जाता है। ऐसे में एक तो बारिस का न होना। वहीं पेयजल संकट से अभी भी दो-चार होना तथा मच्छरों की बढती भरमार और आये दिन निकलते संक्रमितों ने लोगों को दहशत में डाल दिया है। बगैर किसी प्रमाणिक संरचना के सेवकांे का निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन इस बात का प्रमाण है कि कितनी अक्षम, असफल व्यवस्था के हम साक्षी है। सुना है कोरोना पर नियंत्रण हेतु जिला प्रशासन ने एक सटीक शुरूआत करने की कोशिश अवश्य की है। मगर वह कितनी सार्थक सिद्ध होगी फिलहाल भविष्य के गर्भ में है।
कारण व्यवहारिक अनुभव से अनभिज्ञ निर्णय और संचालन की र्निजीवता इस बात का प्रमाण है कि जरा-सी चूक ने समूचे शहर को कितने बडे संकट में झौंक दिया है। काश नौकरी करने की बैवसी के जगह लोगों ने व्यवहारिक पुरूषार्थ दिखाया होता और लोगों की मदद से कोरोना के खिलाफ संघर्ष को सर अंजाम दिया होता, तो वर्षो से कष्ट भोगते उस शहर को जिन्दगी मौत के खेल में उलझ अपनी बहुमूल्य जिन्दगियों को दांव न लगाना पडता। शायद इस सच को शहर के लोग समझ पाये और शासन समय रहते सदजनो के सहयोग से सदमार्ग निकाल इस भयाभय बीमारी से शहर को बचा पाये।
शिवपुरी। जिस उत्साह के साथ शिवपुरी में कोरोना के खिलाफ जंग शुरू हुई थी चार माह गुजरते ही अब वह चारोखाने चित दिखाई पडती है। कोरोना के कोहराम ने विगत चार माह से सिर्फ कोरोना ही नहीं शेष अन्य बीमारियों से जूझते लोगों का जहां जीवन नरक बना दिया, तो वहीं दूसरी ओर रोजमर्रा की मजदूरी कर पेट भरने वाले या मध्यम दर्जे के व्यवसाय करने वालों को खून के आंसू रूलाने छोड दिया है। अब जबकि यह बीमारी और संक्रमणकाल के रूप में इस मौसम को जाना जाता है। ऐसे में एक तो बारिस का न होना। वहीं पेयजल संकट से अभी भी दो-चार होना तथा मच्छरों की बढती भरमार और आये दिन निकलते संक्रमितों ने लोगों को दहशत में डाल दिया है। बगैर किसी प्रमाणिक संरचना के सेवकांे का निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन इस बात का प्रमाण है कि कितनी अक्षम, असफल व्यवस्था के हम साक्षी है। सुना है कोरोना पर नियंत्रण हेतु जिला प्रशासन ने एक सटीक शुरूआत करने की कोशिश अवश्य की है। मगर वह कितनी सार्थक सिद्ध होगी फिलहाल भविष्य के गर्भ में है।
कारण व्यवहारिक अनुभव से अनभिज्ञ निर्णय और संचालन की र्निजीवता इस बात का प्रमाण है कि जरा-सी चूक ने समूचे शहर को कितने बडे संकट में झौंक दिया है। काश नौकरी करने की बैवसी के जगह लोगों ने व्यवहारिक पुरूषार्थ दिखाया होता और लोगों की मदद से कोरोना के खिलाफ संघर्ष को सर अंजाम दिया होता, तो वर्षो से कष्ट भोगते उस शहर को जिन्दगी मौत के खेल में उलझ अपनी बहुमूल्य जिन्दगियों को दांव न लगाना पडता। शायद इस सच को शहर के लोग समझ पाये और शासन समय रहते सदजनो के सहयोग से सदमार्ग निकाल इस भयाभय बीमारी से शहर को बचा पाये।

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