मौके पर चौका सियासी घमासान में कांपती सत्ता बेहाल सेवा कल्याण पर अंतिम पंक्ति के हुजूम में मार्मिक हलचल
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
भले ही देश के पश्चिमी राज्य राजस्थान में मचे सियासी घमासान को लेकर सत्ता कांप रही हो और वोट के माध्यम से सत्ता को अंगीकार करने वाले लोग उठा-पटक के हालात देख बदबहास हो, मगर कहते है कि जैसे को तैसा मिलना नियति के हाथ होता है। बैसे भी कहा जाता है कि सत्ता अहंकारी, अंधी होती है जो अपना संचालन करने तंत्र के सामने बाध्य होती है। अगर कोई सियासी दल पूर्व में बोया आज काटे तो इसमें किसी को हर्ज नहीं होना चाहिए। क्योंकि सत्ता का स्वभाव ही कुछ ऐसा होता है। मगर म.प्र. के मुखिया के कोरोना संक्रमित होने की दूसरी पाॅजिटिव रिपोर्ट ने सेवा कल्याण की आस लगाये अतिम पंक्ति में खडे व्यक्ति को खासा हताश-निराश कर रखा है। इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि बिगडी व्यवस्था के बीच अपने पिछले कार्यकाल के दौरान जिस तरह से म.प्र. के मुख्यमंत्री ने आम दीनहीन गरीब और अंतिम पंक्ति में खडे व्यक्ति तक सरकारी खजाने की राहत विभिन्न माध्यमों से पहुंचाने की कोशिश की उसे झुठलाया नहीं जा सकता। मगर कहते है कि सियासत होती ही ऐसी चीज है जो कब निहित स्वार्थो के लिए क्या कर दें किसी को पता नहीं होता। निश्चित ही पिछले कार्यकाल में सत्ता का वह अहंकार ही था और अपनों का तिरस्कार जिसने एक सेवा कल्याण में जुटी सरकार को सडक पर लाकर खडा कर दिया। सियासी बाध्यता और अवसर के बीच जैसे-तैसे सेवा कल्याण पुनः सत्ता में काबिज हुआ कि कोरोनाकाल के कहर ने सरकार को आ घेरा। बात जैसे-तैसे विकास कल्याण की आगे बढ ही रही थी और कंगाल सरकार में व्यवस्थायें आर्थिक रूप से सुधर ही रही थी कि सहयोगियों की असावधानी और सत्ता के अहंकार ने सरकार के मुखिया को इस स्थिति में पहुंचा दिया कि लोग दुखित है जिसकी चर्चा आम लोग करते नहीं थकते। ये अलग बात है कि म.प्र. के मुख्यमंत्री सेवा कल्याण की लकीर को आगे खींचते हुए अस्पताल में चिकित्सा लाभ लेने के बावजूद अपने सेवा कल्याण में जुटे है। निश्चित ही म.प्र. के करोडो-करोड लोगों की सदभावना उनके साथ हो और वह स्वस्थ हो अपने सेवा कल्याण के कार्यो को और दुर्तगति से आगे ले जाये। मगर कहते है कि सेवा कल्याण अलग बात है और सियासत अलग बात। अब देखना यह है कि लोकतंत्र में छिडे सियासी संघर्ष में जीत सेवा कल्याण की होती है या फिर स्वार्थवत षडयंत्रपूर्ण सियासतों की यह आज के आम नागरिक को समझने वाली बात होना चाहिए।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
भले ही देश के पश्चिमी राज्य राजस्थान में मचे सियासी घमासान को लेकर सत्ता कांप रही हो और वोट के माध्यम से सत्ता को अंगीकार करने वाले लोग उठा-पटक के हालात देख बदबहास हो, मगर कहते है कि जैसे को तैसा मिलना नियति के हाथ होता है। बैसे भी कहा जाता है कि सत्ता अहंकारी, अंधी होती है जो अपना संचालन करने तंत्र के सामने बाध्य होती है। अगर कोई सियासी दल पूर्व में बोया आज काटे तो इसमें किसी को हर्ज नहीं होना चाहिए। क्योंकि सत्ता का स्वभाव ही कुछ ऐसा होता है। मगर म.प्र. के मुखिया के कोरोना संक्रमित होने की दूसरी पाॅजिटिव रिपोर्ट ने सेवा कल्याण की आस लगाये अतिम पंक्ति में खडे व्यक्ति को खासा हताश-निराश कर रखा है। इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि बिगडी व्यवस्था के बीच अपने पिछले कार्यकाल के दौरान जिस तरह से म.प्र. के मुख्यमंत्री ने आम दीनहीन गरीब और अंतिम पंक्ति में खडे व्यक्ति तक सरकारी खजाने की राहत विभिन्न माध्यमों से पहुंचाने की कोशिश की उसे झुठलाया नहीं जा सकता। मगर कहते है कि सियासत होती ही ऐसी चीज है जो कब निहित स्वार्थो के लिए क्या कर दें किसी को पता नहीं होता। निश्चित ही पिछले कार्यकाल में सत्ता का वह अहंकार ही था और अपनों का तिरस्कार जिसने एक सेवा कल्याण में जुटी सरकार को सडक पर लाकर खडा कर दिया। सियासी बाध्यता और अवसर के बीच जैसे-तैसे सेवा कल्याण पुनः सत्ता में काबिज हुआ कि कोरोनाकाल के कहर ने सरकार को आ घेरा। बात जैसे-तैसे विकास कल्याण की आगे बढ ही रही थी और कंगाल सरकार में व्यवस्थायें आर्थिक रूप से सुधर ही रही थी कि सहयोगियों की असावधानी और सत्ता के अहंकार ने सरकार के मुखिया को इस स्थिति में पहुंचा दिया कि लोग दुखित है जिसकी चर्चा आम लोग करते नहीं थकते। ये अलग बात है कि म.प्र. के मुख्यमंत्री सेवा कल्याण की लकीर को आगे खींचते हुए अस्पताल में चिकित्सा लाभ लेने के बावजूद अपने सेवा कल्याण में जुटे है। निश्चित ही म.प्र. के करोडो-करोड लोगों की सदभावना उनके साथ हो और वह स्वस्थ हो अपने सेवा कल्याण के कार्यो को और दुर्तगति से आगे ले जाये। मगर कहते है कि सेवा कल्याण अलग बात है और सियासत अलग बात। अब देखना यह है कि लोकतंत्र में छिडे सियासी संघर्ष में जीत सेवा कल्याण की होती है या फिर स्वार्थवत षडयंत्रपूर्ण सियासतों की यह आज के आम नागरिक को समझने वाली बात होना चाहिए।

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