इतिहास रचने में कामयाब सरकार सृष्टि, सृजन में, ज्ञान ही समृद्ध सुसंस्कृत, खुशहाल जीवन का मूल आधार संतुलन सिद्धान्त के विरूद्ध शिक्षा पद्धति और विषय वस्तु बेकार शिक्षा नीति से पूर्व खुला शास्त्रार्थ अहम
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
व्यवहारिक, ज्ञान-विज्ञान से पटे पडे विधानों को दरकिनार कर फलित जीवन ने जिस तरह से स्वार्थवत अंहकारी आसुरी, साम्राज्यवादी दौरों से दो-चार होते मेकाले के शिक्षा सिद्धान्त का लम्बा सफर मानव जीवन में तय किया है। ऐसा नहीं कि समूचा मौजूद भूभाग अन्य शिक्षा विदों से या उनके विचारों से बांझ रहा हो। अगर यो कहे कि मेकाले के अलावा भी विभिन्न भूभागों पर कई महान शिक्षाविद सुधारक, शिक्षक, आचार्य, संत, ऋषिमुनि संन्यासी विभिन्न कालखण्डों में हुए और उन्होंने अपनी वैचारिक पहचान सृष्टि, सृजन में अपने सामर्थ और पुरूषार्थ के बल स्थापित की। जिन्होंने अपने भव्य-दिव्य सृजनपूर्ण ज्ञान से सृष्टि, सृजन में संतुलन सिद्धान्त की महत्वता को इंगित करते हुए मानव जीवन का मार्गदर्शन जीवन को समृद्ध खुशहाल बनाने में अपना बहुमूल्य योगदान दिया। फिर उनके जीवन में इस योगदान की कीमत अपनी जान देकर भी उन्हें क्यों न चुकानी पडी हो। मगर उन्होंने मानव के रूप में मानव धर्म और सृष्टि सिद्धान्त से कभी समझौता नहीं किया। मगर हम यहां मेकाले की चर्चा करने आज इसलिए बाध्य है कि जिस भूभाग पर जीवन, ज्ञान, विज्ञान को मेकाले की शिक्षा नीति ने सत्ता के इशारे पर मानव जीवन को सर्वाधिक प्रभावित कर सृजन में मानव जीवन का अर्थ ही बदल दिया। वहां शिक्षा नीति 2020 की चर्चा 70 वर्ष बाद आज प्रबल है यह मौजूदा सरकार और शासकों का पुरूषार्थ ही कहा जायेगा कि उन्होंने कम से कम अपने सामर्थ से शिक्षा के क्षेत्र में एक नई शुरूआत की कोशिश तो की।
ये अलग बात है कि अभी इस शिक्षा नीति के सार्थक, शास्त्रार्थ और सृष्टि, सृजन में संतुलन के सिद्धान्त का केन्द्र स्थापित होना अभी शेष है। जिससे फिलहाल मानव जगत को न तो फिलहाल हताश-निराश होने की जरूरत है और न ही दोषारोपण सहित आरोप-प्रत्यारोप की व्याख्या की आवश्यकता। यह सत्य है कि अगर सार्थक शुरूआत हुई है तो समय के साथ समझ प्रकृति प्रदत्त व्यवहारिक ज्ञान-विज्ञान का समावेष और शिक्षा पद्धति का विस्तार आज नहीं तो कल अवश्य होगा और सृजन में सृष्टि के सिद्धान्त मानव जीवन में संतुलन सिद्धान्त पर निष्पक्ष, निष्कलंक शास्त्रार्थ को भी स्थान मिलेगा। क्योंकि स्वराज की प्रथम पहचान ही सत्य और मानव जीवन में उसका नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप स्वीकार्यता ही है जिसमें सुर-असुर सभी प्रवृतियों का समावेष इस आशा-आकांक्षा के साथ होता है कि वह सत्य से विमुख नहीं, जिसका मूल आधार ज्ञान की छत्र-छाया में समृद्ध, सुसंस्कृत खुशहाल जीवन का निर्माण है जो हजारों वर्ष बाद भी सृष्टि, सृजन में स्वतः सिद्ध है और प्रमाणिक भी। वह आध्यात्म और विज्ञान दोनो ही रूप में हमारे सामने है। जरूरत सिर्फ स्वार्थवत सोच और सर्वकल्याण की समझ की है जो सत्य है और सटीक ज्ञान भी। काश समूचा भारतवर्ष ही नहीं, समूचे विश्व का मानव जगत इस सच को समझ पाये और जीवन के आध्यात्म स्वरूप पंचतत्व तथा ऊर्जा उघगम उसके सृजन और समागम के विज्ञान का विश्लेषण सटीक प्रमाणिक तौर पर वैज्ञानिक पद्धतियों के आधार पर प्राकृतिक सिद्धान्त अनुरूप कर पाये, तो मानव जीवन ही नहीं समूचे जीव जगत के जीवन के सारे समाधान और सत्य का स्वरूप प्रमाणिक रूप से मानव जीवन के सामने होगा, जो आज की सबसे बडी आवश्यकता है और सर्वकल्याण सहित समृद्ध, खुशहाल जीवन की सबसे बडी बाधा।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
व्यवहारिक, ज्ञान-विज्ञान से पटे पडे विधानों को दरकिनार कर फलित जीवन ने जिस तरह से स्वार्थवत अंहकारी आसुरी, साम्राज्यवादी दौरों से दो-चार होते मेकाले के शिक्षा सिद्धान्त का लम्बा सफर मानव जीवन में तय किया है। ऐसा नहीं कि समूचा मौजूद भूभाग अन्य शिक्षा विदों से या उनके विचारों से बांझ रहा हो। अगर यो कहे कि मेकाले के अलावा भी विभिन्न भूभागों पर कई महान शिक्षाविद सुधारक, शिक्षक, आचार्य, संत, ऋषिमुनि संन्यासी विभिन्न कालखण्डों में हुए और उन्होंने अपनी वैचारिक पहचान सृष्टि, सृजन में अपने सामर्थ और पुरूषार्थ के बल स्थापित की। जिन्होंने अपने भव्य-दिव्य सृजनपूर्ण ज्ञान से सृष्टि, सृजन में संतुलन सिद्धान्त की महत्वता को इंगित करते हुए मानव जीवन का मार्गदर्शन जीवन को समृद्ध खुशहाल बनाने में अपना बहुमूल्य योगदान दिया। फिर उनके जीवन में इस योगदान की कीमत अपनी जान देकर भी उन्हें क्यों न चुकानी पडी हो। मगर उन्होंने मानव के रूप में मानव धर्म और सृष्टि सिद्धान्त से कभी समझौता नहीं किया। मगर हम यहां मेकाले की चर्चा करने आज इसलिए बाध्य है कि जिस भूभाग पर जीवन, ज्ञान, विज्ञान को मेकाले की शिक्षा नीति ने सत्ता के इशारे पर मानव जीवन को सर्वाधिक प्रभावित कर सृजन में मानव जीवन का अर्थ ही बदल दिया। वहां शिक्षा नीति 2020 की चर्चा 70 वर्ष बाद आज प्रबल है यह मौजूदा सरकार और शासकों का पुरूषार्थ ही कहा जायेगा कि उन्होंने कम से कम अपने सामर्थ से शिक्षा के क्षेत्र में एक नई शुरूआत की कोशिश तो की। ये अलग बात है कि अभी इस शिक्षा नीति के सार्थक, शास्त्रार्थ और सृष्टि, सृजन में संतुलन के सिद्धान्त का केन्द्र स्थापित होना अभी शेष है। जिससे फिलहाल मानव जगत को न तो फिलहाल हताश-निराश होने की जरूरत है और न ही दोषारोपण सहित आरोप-प्रत्यारोप की व्याख्या की आवश्यकता। यह सत्य है कि अगर सार्थक शुरूआत हुई है तो समय के साथ समझ प्रकृति प्रदत्त व्यवहारिक ज्ञान-विज्ञान का समावेष और शिक्षा पद्धति का विस्तार आज नहीं तो कल अवश्य होगा और सृजन में सृष्टि के सिद्धान्त मानव जीवन में संतुलन सिद्धान्त पर निष्पक्ष, निष्कलंक शास्त्रार्थ को भी स्थान मिलेगा। क्योंकि स्वराज की प्रथम पहचान ही सत्य और मानव जीवन में उसका नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप स्वीकार्यता ही है जिसमें सुर-असुर सभी प्रवृतियों का समावेष इस आशा-आकांक्षा के साथ होता है कि वह सत्य से विमुख नहीं, जिसका मूल आधार ज्ञान की छत्र-छाया में समृद्ध, सुसंस्कृत खुशहाल जीवन का निर्माण है जो हजारों वर्ष बाद भी सृष्टि, सृजन में स्वतः सिद्ध है और प्रमाणिक भी। वह आध्यात्म और विज्ञान दोनो ही रूप में हमारे सामने है। जरूरत सिर्फ स्वार्थवत सोच और सर्वकल्याण की समझ की है जो सत्य है और सटीक ज्ञान भी। काश समूचा भारतवर्ष ही नहीं, समूचे विश्व का मानव जगत इस सच को समझ पाये और जीवन के आध्यात्म स्वरूप पंचतत्व तथा ऊर्जा उघगम उसके सृजन और समागम के विज्ञान का विश्लेषण सटीक प्रमाणिक तौर पर वैज्ञानिक पद्धतियों के आधार पर प्राकृतिक सिद्धान्त अनुरूप कर पाये, तो मानव जीवन ही नहीं समूचे जीव जगत के जीवन के सारे समाधान और सत्य का स्वरूप प्रमाणिक रूप से मानव जीवन के सामने होगा, जो आज की सबसे बडी आवश्यकता है और सर्वकल्याण सहित समृद्ध, खुशहाल जीवन की सबसे बडी बाधा।
जय स्वराज
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