दुर्लभ अवसर गंवाता मानव कलंकित होती अनमोल कृति प्राकृतिक सिद्धान्त को पलीता लगाता पुरूषार्थ संतुलन को चुनौती देता सामर्थ

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
शिक्षा कालखण्ड अनुसार जो भी रही हो, शिक्षा ग्रहण करने की पद्धतियां जैसी भी रही हो, जिससे र्निमित शिक्षित सु-संस्कृत समाज कभी मानव जीवन के दुर्लभ अवसर को इस तरह से गवा प्रकृति की अनमोल कृति को कलंकित करेगा किसी ने सपने में भी न सोचा होगा। प्राकृतिक सिद्धान्त को पलीता लगाता पुरूषार्थ मानव समाज में आज एक ऐसा यक्ष प्रश्न बन गया है जो आज अपने सामर्थ के बल पर संतुलन तक को चुनौती देने से नहीं चूक रहा। कभी सुर-असुर प्रवृतियों के बीच समृद्ध, खुशहाल जीवन जीने वाला मानव ऐसी र्दुगति में जा पहुंचेगा, जहां से समृद्ध, खुशहाल जीवन के लिए सृजन का मार्ग कंटकों से भरा पडा हो। आज मानवीय जीवन में जितनी भी विसंगतियां सृजन के दौरान मौजूद है वह मानव जाति के द्वारा बुने गए जाल में उलझती नजर आती है। जीवन निर्वहन के सत्य को आध्यात्म और र्निजीव विधा को विधान की उपलब्धि मान जीवन निर्वहन करने वाले आज अपनी कृतज्ञता को ही कलंकित करने से नहीं चूक रहे, बल्कि संतुलन के सिद्धान्त को भी चुनौती देने में नहीं हिचक रहे। आज जब समूची दुनिया कोरोना जैसी महामारी की दहशत से खौप जदा है और निदान के माध्यम शून्य। ऐसे में मानवीय जीवन की उपलब्धियों की समीक्षा उसके पुरूषार्थ सामर्थ की चर्चा दीनहीन-क्र्षीण हालात में मौजूद मानव जीवन के दुर्लभ अवसर को अपने ही कृत्यों से गंवाते सृजन में एक अवसर के रूप में साफ नजर आती है। कहते है कि ऐसा नहीं कि संतुलन बिगाड खाता इस महान भूभाग पर होना कोई पहली घटना हो। इससे पूर्व भी कई उदाहरण मानव जाति ने देखे है। लेकिन तब और अब की स्थिति में अंतर सिर्फ इतना है कि तब लोग सर्वकल्याण और मानव धर्म की रक्षा के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर करने से नहीं हिचकते थे और अपने कत्र्तव्यों को ही सर्वोपरि मान जीवन में आचार-व्यवहार रखते थे। मगर स्व-स्वार्थ की प्रष्ठफुटित संस्कृति ने आज मानव को कहीं का नहीं छोडा। भले ही लोग आज के नैसैर्गिक स्वभाव के रूप में स्वीकार्य करे या न करे, मगर सत्य यहीं है। 
जय स्वराज

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