जीवनदायनी के अंत पर उतारू जीवन संरक्षक बनते संहारक अपने हकों को सडकों पर भटकता बेजुबान गौधन

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
अब इसे सृजन में सृष्टि की विडम्बना कहे या उस आत्मनिर्भर गौधन का दुर्भाग्य जिसका सहषणु जीवन और नैसर्गिक स्वभाव ही उसके लिए अभिशाप बन गया है और जीवंतदायनी शब्द उसे उसके जीवन का अंत नजर आने लगा है। कहते है जब संरक्षक ही संहारक की मुद्रा में नजर आये तो ऐसी संभावनाऐं बलवती होना स्वभाविक है। कौन नहीं जानता कि अनादिकाल से गौवंश गौधन के रूप में जाना जाता रहा है और अपने निष्ठापूर्ण आत्मनिर्भर कत्र्तव्य निर्वहन के बल पर नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप पूजा जाता रहा है। मगर दुर्भाग्य कि आज वहीं मानव नस्ल जिसकी पीढियों को अनादिकाल से गौधन ने अपने खून-पसीने से सींच समृद्ध स्वस्थ और खुशहाल बनाता आया वह भी अपने नौनिहालों का हक छीन आज वहीं गौधन को मानव जीवन खून की आंसू रूलाने पर आमदा ही नहीं, बल्कि उसके सहषणु आत्मनिर्भर और सदभाव भरे जीवन को संकटग्रस्त बना रहा है यह वहीं भारतवर्ष है जहां स्वयं प्रभु कृष्ण ने गौधन की सेवा कर स्वयं को धन्य समझ लोगों को धन्य-धान होने का संदेश गौधन की सेवा कर दिया। आज उसी महान भारत भूभाग पर जहां हर जीव का जीवन कानूनी रूप से संरक्षित है। मगर वहीे गौधन के संरक्षण के लिए कानून तो है। मगर उनका व्यवहारिक संरक्षण नहीं। कारण वह काला वन अधिनियम जिसके तहत गौधन को जंगल चरने पर मनाही है। दूसरा जो गौधन के हक की जमीन गौचर भूमि के नाम से संरक्षित थी उसे मानव की संवैधानिक आजादी और कानून के रखवालों की अर्कमण्यता के चलते छीन लिया गया। रही सही कसर उजडते तालाब अंधा-धुंध बोर करने-कराने के जुनून ने सारे तालाब, कुंओ, नदी, झरनों को सुखाकर पूरा कर दिया। अब हालात ये है कि अन्न जल और अपनी भूमि से बेदखल यह गौधन अपना मुफलिसी भरा जीवन अनाथ बन या तो सडकों पर या फिर राक्षसी प्रवृति के लोगों के के बीच गांवों में डंडे खा-खा खाकर बिता रहा है। क्योंकि गौधन न तो जंगली जीव बचा और न ही पालतू पशु रहा और न ही वर्तमान हालातों में लोगों के बीच पूज्यनीय नजर आता है। हालात यहां तक आ पहुंचे कि राक्षसी सोच के चलते चंद रूपयों की खातिर उन्हें कत्लखानों तक का सफर बैवसी भरे अंदाज में पूर्ण करना पड रहा है। जबकि समस्त जीवों में गौधन ऊर्जा एवं अन्न स्वास्थ्यवर्धक औषधियों से भरा वह आत्मनिर्भर जीव है जो पैदा होने से लेकर मृत्यु उपरान्त तक मानव जीवन के लिए उपयोगी सिद्ध रहा है। जिसने बगैर भेदभाव के अपने बच्चों का हक छीनने वालो तक से कभी कोई शिकायत नहीं की, न ही अनादिकाल से आत्मनिर्भर इस जीव ने भोजन, पानी और रहने किसी जगह की उम्मीद की। मगर आज जिस तरह से इस जीव का जीवन संकटग्रस्त और अंत की ओर अग्रसर है उसे देखकर तो यहीं कहा जा सकता है कि घोर कलयुग है जिसमें मानव जीवनदायनी का ही दुश्मन, जो स्वयं स्वार्थो में डूब मानव अपने ही जीवन का दुश्मन बन गया है। अगर इस भूभाग पर हर जीव का कोई न कोई वैद्यानिक हक है तो फिर गौधन को उसका हक क्यों नहीं, आज के समय में मानव जाति के लिए यह सबसे बडी समझने वाली बात होनी चाहिए। 

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