दबे पांव दहशत बढाता कोरोना विश्व का आंकडा 2 करोड के पार

व्ही.एस.भुल्ले

विलेज टाइम्स समाचार सेवा।

कहते है इस दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं, मगर पाने की ललक और प्रयास सर्वोत्तम होने चाहिए। जिनके रथ पर सवार हो किसी भी समाधान को चक्रवती सम्राट बना, उसकी ध्वजा पताका फहराई जा सकती है। मानवीय सभ्यता से जुडा आध्यात्म इतिहास इस बात का गवाह है कि जब-जब उचित साध्य के लिए उत्तम साधनों का उपयोग हुआ है परिणाम सार्थक और सफल रहे। अगर हम भारतवर्ष की ही बात करें तो अगर कोरोना के शुरूआती दौर में ही बगैर सियासत के सार्थक कदम उठा सिस्टम को सटीक दिशा में सक्रिय किया जाता और सियासी सलाहकार तथा अहंकारी व्यवस्था का समन्वय समय रहते सही दिशा में बनाया जाता तो भारत में भी संक्रमितों की संख्या 26 लाख के पार तथा प्रतिदिन के पार 50 हजार के पार न होती, न ही देश को आर्थिक दुर्गति का सामना करना पडता। लेकिन कहते है कि मानव भूल का पुतला है सो इतने बडे देश की व्यवस्था में भूल-चूक होना स्वभाविक है और सियासी सरोकार सियासत की मजबूरी। मगर अभी भी बहुत कुछ नहीं बिगडा क्योंकि संक्रमितों का रिकवरी रेड सुधार पर है जिसका प्रतिशत लगभग 72 के आसपास है। मगर जिस तरह से छोटे-छोटे शहरों में संक्रमितों की संख्या दिन दूनी रफ्तार बढ रही है वह न तो सियासत के लिए ठीक है और न ही सत्ताओं के लिए। क्योंकि जिस देश में 80 करोड के आसपास सस्ते राशन के मोहताज लोग है और 50 करोड के आसपास स्वास्थ्य, सुरक्षा के मोहताज हो। ऐसे में इस महामारी की भया-भयता और इसके परिणामों का अंदाजा लगाया जा सकता है। अगर अभी भी सत्तायें अनलाॅकडाउन को रखते हुए गांव, नगर, जिलें और राज्यों की सीमाओं पर चैंकिंग एंबुलेंस और संसाधनों की व्यवस्था कर लोगों का आवागमन सुव्यवस्थित बना हर जिले में आबादी से दूर कोरोन केयर सेन्टरों की अस्थाई रूप से स्थापना करने में सफल होती है तो एक बडी राहत की उम्मीद इतने बडे देश में की जा सकती है। मगर यह सब करना सत्ता और सिस्टम के ही वैद्यानिक हाथों में है जिसमें वह देश के नागरिकों, समाजसेवियों की मदद लेकर स्वास्थ्य, राशन लाईन को व्यवस्थित बना लोगों को इस महामारी से बचा सकती है। 

जय स्वराज 

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