अर्थ युग में कुलाछे भरता हाईटेक लोकतंत्र अघोषित लिमिटेड, प्रायवेट लिमिटेड के बाद बहु-राष्ट्रीय तंत्र में तब्दील सियासी तंत्र मलाई कूटते माई-बाप मातम मनाते लोग

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।

कहते है सृजन में सहयोग सम्मान, स्वाभिमान, प्रेम, समर्पण का भाव स्वतः सिद्ध होता है और संतुलन के लिए सृजन में संघर्ष और संहार का विधान भी होता है। मगर सृजन में संतुलन की खातिर दोनों का ही स्थान अहम रहता है तथा मानव कल्याण की कल्पना नैसर्गिक विधान अनुरूप सतयुग, श्रेता, द्वापर का सफर तय कर आज भले ही कलयुग के मुहाने पर हो। मगर अर्थयुग चहुंओर जिस तरह से पैर जमा चुका है और समूचा सियासी तंत्र लिमिटेड, प्रायवेट लिमिटेड और बहुराष्ट्रीय तंत्र के रास्ते चल पडा हो। ऐसे में हाईटेक लोकतंत्र की चर्चा स्वतः बलबती हो जाती है। अघोषित काॅरपोरेट कल्चर में तब्दील सियासी तंत्र से जीवंत कल्याण की उम्मीद भले ही बैमानी लगे। मगर मानव कल्याण, लोककल्याण, जनकल्याण में इसका खुलकर उपयोग यह समझने काफी है कि सियासी मेनेजरों के बल पर स्क्रिप्ट पढते जबावदेह लोग भले ही प्रतीक मात्र चेहरा और लोगों के आदर्श हो मगर इनसे कलफती आशा-आकांक्षाओं का भला होने वाला नहीं। फिर क्षेत्र आर्थिक, सामामिक, राजनीतिक या धार्मिक हो या फिर व्यवहारिक सभी दूर एक सन्नाटा-सा खिचा पडा है और जीवंत, सोशल मीडिया और दिग-दर्शन आबाद अघोषित लिमिटेड, प्रायवेट लिमिटेड और बहुराष्ट्रीय सोच के अश्व पर सवार मौजूद सियासत आमजन की लोकतांत्रिक कमजोरी तथा विधि उन्मुख बैवसी का लाभ उठा, इस अर्थयुग में अपने-अपने में राष्ट्र, जनकल्याण के मंसूबों को भले ही पूरा करना चाहते हो। मगर लोककल्याण, जनकल्याण, राष्ट्र कल्याण के नाम सियासत में जिस संघर्षपूर्ण संस्कृति, संस्कारों का प्रार्दुभाव हो रहा है वह किसी भी राष्ट्र-जन, समाज और लोककल्याण में शुभ नहीं कहे जा सकते, जो आज मानव समाज के लिए चिन्ता का विषय हो सकता है। मगर कहते है कि जब सत्ता, सियासत को लक्ष्य मानव, लोक जन, राष्ट्र, जीवन कल्याण का भाव हो, तो वह सराहनीय और स्वीकार्य कहा जाता है। मगर जब वहीं कृत्य, कृतज्ञता के लक्ष्य के विरूद्ध होता है तो वह अस्वीकार्य ही नहीं, उसे पीढियों तक कोसा जाता है। ये अलग बात है कि सियासत में अघोषित बहु-राष्ट्रीय संस्कृति हावी होने से अघोषित लिमिटेड, प्रायवेट लिमिटेड या नई-नई फर्म, प्रतिष्ठान व्यक्तियों के अस्तित्व सियासत में, खतरे में हो जो अपनी पहचान बचाने या तो काॅरपोरेट कल्चर अनुरूप बहुराष्ट्रीय कंपनियों में खुद को समाहित कर या उनकी दास्ता स्वीकार्य कर अपना-अपना अस्तित्व बचाने में जुटी है, तो कुछ लिमिटेड, प्रायवेट लिमिटेड आज भी अद-कचरे संघर्ष के सहारे स्वयं के समृद्ध भविष्य के सपने अपने मेनेजरों के माध्यम से खोजने में जुटी है। कारण साफ है कि जिस वैचारिक आधार की प्रमाणिकता या प्रोडक्ट का प्रचार-प्रसार दुरूस्त होता है और पूंजी लगाने धन का भंडार। कहते है कि आज के समय में असली बाजार का हकदार वहीं होता है फिर चाहे वह बाजार समाज, सियासत, राजनीति, धर्म व्यवहार का हो या फिर उसका स्वार्थवत आधार हो। बैसे भी सत्ता अनादिकाल से स्वचारी, अहंकारी होने के नाम कभी कलंकित, तो कभी सिद्ध रही है जिसकी शिकार हमेशा मानवता ही रही है। इसलिये कहते है कि अहंकारी, स्वचारित सत्ता कितनी ही कल्याणकारी  क्यों न दिखे उसके साथ संतुलन सिद्धान्त और सर्वकल्याण के साथ प्रतिभाओं को स्वच्छंद नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप लोक-कल्याण में योगदान के अवसर सुरक्षित, सरंक्षित अवश्य होना चाहिए, न कि उन पर बाध्यतायें। क्योंकि मानव जीवन मानव के लिए सृष्टि में अमूल्य अवसर होता है। उसकी नैसर्गिक भावनाओं, जीवन निर्वहन, पुरूषार्थ पर स्वचारी लगाम उतना बडा ही अपराध है जितना बडा द्वापर, श्रेता में माना गया। फिर कालखंड जो भी रहे हो, अगर सृजन में निष्ठा है और मानव कत्र्तव्य के प्रति सजग तो उसे संतुलन सिद्धान्त का पालन अवश्य करना चाहिए फिर वो सियासत हो या सेवा कल्याण, आज यही सबसे बडी समझने वाली बात है। 

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