काउंटर किल्लर संस्कृति में दम तोडता सामर्थ पुरूषार्थ गैंगबंद सियासत से कमजोर होता, समृद्ध सृजन सिद्ध सामर्थ, प्रमाणिक पुरूषार्थ, का आधार संतुलन अविश्वास, पूर्वाग्रह कमजोर संकल्प का आधार
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है गैंगबंद होना या संगठित रहना समृद्ध सामर्थ और पुरूषार्थ की पहचान होती हो, मगर इतिहास से अनुभव और वर्तमान पुरूषार्थ का साक्षी होता है जिसके आधार पर भविष्य का निर्माण सिद्ध होता है। ऐसे में अगर संकल्प सिद्धि के लिए अविश्वास, पूर्वाग्रह की बेसागियों पर समृद्ध खुशहाल जीवन की कल्पना सार्वजनिक जीवन का आधार हो तथा शान्त समृद्ध जीवन के लिए सृजन में संघर्षपूर्ण साधन साध्य हो, तो वह सामर्थ पुरूषार्थ संतुलन के आभाव में कभी सिद्ध नहीं हो सकता। अगर ऐसे में काउंटर किल्लर संस्कृति के बीच सृजन में सडे सिस्टम से समृद्ध खुशहाल जीवन की खोज हो, तो वह असंभव ही नहीं, नमुमकिन होती है। क्योंकि मानव जीवन में जीवंत निर्वहन के माध्यम भी उसकी सफलता असफलता का मूल आधार बनते है वर्तमान और भविष्य की दिशा और दशा तय करते है। क्योंकि किसी भी व्यवस्था में संकल्प लक्ष्य की रीड होता है तो सिस्टम उसका नर्वस सिस्टम जो जीवन को स्वच्छंद फलने फूलने का मार्ग सुनिश्चित करता है और जिससे एक समृद्ध खुशहाल जीवन का निर्माण होता है फिर जीवन निर्वहन की व्यवस्था लोकतांत्रिक हो या राजतांत्रिक। सर्वकल्याण का मूल आधार संतुलन के रास्ते ही होकर जाता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्तायें सिस्टम की वैशागियों पर निर्भर रही है, तब-तब आत्मनिर्भरता का सपना अधूरा ही रहा है। कहते है कि जिस सभा या दरबार में मौजूद सभाषदों की रूचि सृजन के बजाये काउंटर किल्लर के रूप में दर्ज हुई है उस सभा और दरबार में सृजन संकल्प दम तोडते और सामर्थ पुरूषार्थ विधा, विद्ववानों को अपमान झेलना पडा है। इस सत्य को आज की सियासत और सत्ताओं को नहीं भूलना चाहिए जो हमें हमारा आध्यात्म भी सिखाता है और विज्ञान भी बताता है। मगर दुर्भाग्य कि आज की गैंगबंद सियासत में ऐसी सत्तायें और सभायें मौजूद है जहां सृजन से अधिक काउंटर किल्लरों का बोलबाला है चाहे वह प्रतिभा, विधा, विद्ववान और विलक्षण प्रतिभाओं के सामर्थ और पुरूषार्थ से जुडा क्षेत्र हो या फिर सृजनपूर्ण सियासत को लेकर सवाल। किसी भी व्यक्ति, परिवार, समाज का आधार तब तक मजबूत और समृद्ध खुशहाल नहीं हो सकता जब तक कि लोगों को सियासत से इतर नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप प्रदर्शन के सहज अवसर उपलब्ध नहीं हो और उन सत्ता, सौपानों तक सृजनकर्ताओं की पहुंच, जहां से समृद्ध, खुशहाल जीवन की दशा और दिशा तय कर सामर्थ और पुरूषार्थ का प्रदर्शन किया जाता है।
जय स्वराज

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