मायानगरी के खुले रंगमंच पर मृत्यु की पटकथा........तीरंदाज ?

व्ही.एस.भुल्ले

भैया- कौन नायक, कौन खलनायक हीरो, हीरोईन, डायरेक्टर, प्रोडूसर, लाईट तथा लेखक, टेक्टनीशियन किरदार है। मायानगरी की गगनचुंबी ईमारतों से रंगमंच पर बरसी मौतों का सच क्या है इसका फैसला तो आॅडियंस अर्थात दर्शक ही कर सकते है। मगर मंच, रंग मंच और फिल्म निर्माण के लिए विख्यात-कुख्यात महानगर में कभी ऐसा भी खुला मंच सजेगा किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। मगर कै करू धक्के खाती म्हारी इस महान कद-काटी का, जो कोरोना कहर के बीच खुले रंगमंच की पटकथा में दो-दो प्रदेशों की पुलिस के बीच कानूनी लट्टम लट्ठा का नंगा नाच देख रहा हूं, अब तो म्हारे तोता मिट्ठुओं की टोली भी इस रंगमंच पर अपने-अपने किरदार निभाने सरेआम कूद पडी है आखिर इस पटकथा का सच क्या है ?

भैये- चुनाव चिन्दी, चन्दा पार्टी गठन से पूर्व सर पर पैर रख कहां भागे जा रहा है और मुंह में गिलौरी डाल, आखिर क्या बढबढा रहा है। 

भैया- सुनना चाहे तो सुन, न तो मने इस भीषण बारिश में 10 जनपथ जा रहा हूं, न ही जेसलमेर, मने तो चुनाव चिन्दी चंदा पार्टी के चिंदी पन्ना सहित विधान गठन की सामग्री सर पर रख चुनाव चंदा पार्टी के गठन से पूर्व ही मां गंगा की गोद में अचमन कर इनका विर्सजन करने जा रहा हूं। पहले हरिद्वार फिर गंगोत्री, मौका मिला तो विर्सजन पश्चात बाबा केदारनाथ के धाम पहुंच भगवान भोलेनाथ के पुनीत दर्शन कर अष्टमी को बृज धाम में मनाऊंगा और वहीं हाथों-हाथ प्रभु बांके बिहारी के दरबार में म्हारे गौवंश के साथ हो रहे घोर अन्याय की अर्जी लगा आऊंगा। क्योंकि तब तक मायानगरी में भी सजे मौत के रंगमंच की कहानी का भी पटाचेप हो चुका होगा और न्याय की बांट जौहती उन मृत आत्माओं को भी न्याय मिल चुका होगा। 

भैये- तने तो गठन से पूर्व ही चुनाव चिन्दी, चंदा पार्टी का विर्सजन कर रहा है यह बात तो म्हारी समझ से परे है कि आखिर तने इतना बडा कदम बगैर संघर्ष के ही ले रहा है और जन्म से पूर्व ही चुनाव चंदा पार्टी की भ्रूण हत्या कर रिया शै। कै थारे को मालूम कोणी म्हारे विधान ही नहीं अब तो संविधान में भी भ्रूण हत्या महापाप ही नहीं, जघन्य अपराध है और लोकतंत्र में अब तो लोक कम सियासी दल ही, सेवा कल्याण का आधार है। 

भैया- कंडे पडे आग बुझे थारे ऐसे सेवक, सेवा कल्याण पर जिसे करने भाई लोगों को इतनी बडी रिस्क, कडी शिक्षा, दीक्षा और अग्नि परीक्षा देना पड रही है और मृत आत्माओं को न्याय के लिए पटना, मुम्बई से लेकर दिल्ली तक माथापच्ची कर छाती कूटना पड रही है। ऐसे-ऐसे जघन्य अपराध और र्दुदान्त झूठ से सनी सियासत आखिर मैं न करना चाहूं, मैं ठहरा गांव का घबई गंवार, मैं कै जाडू कि इतना सफेद झूठ देखते ही देखते गौरा-भूरा होते हुए भी काला हो जावे। 

भैये- मुंये तने तो बावला शै, कै थारे को मालूम कोणी, लोकतंत्र में तो सियासी तौर पर सब चलता है अब तो साम, नाम, दण्ड, भेद का फाॅरमूला सत्ता के लिए पहली शर्त ही नहीं, सत्ता के आभूषण तौर पर चलता है जिसे पहन अब तो हर सियासी व्यक्ति सम्राट बनना चाहता है और सम्राट बनने की शर्त पर ही वह थोकबंद सेवा कल्याण और गाडी भरे सेवकों की फौज अपने पीछे ध्वजा पताकाओं के साथ चाहता है। मगर कै करूं विज्ञान के मोक्ष कुंड में डुबकी लगा स्वर्ग के सपने देखने वाली उस मौजूद भावी पीडी का जो कोरोना के आगे सारी समृद्धि, संसाधन समेटे संक्रमित हो, निढाल नजर आती है। मगर मुई कोई भी शक्ति महाशक्ति यह कहती नजर नहीं आती कि कोरोना की कारगार दवा म्हारी जेब में पडी है। इसलिये भाया मने न लागे इस गैंगबंद, गिरोहबंद सियासत में किसी को जल्द न्याय मिल और सेवा कल्याण होने वाला है। मने तो लागे काडू बोल्या कि भाया जिसकी लाठी उसकी भैंस का फाॅरमूला लोकतंत्र में हाथों-हाथ सफल हो लोकतंत्र का मूलमंत्र बनने वाला है। 

जय-जय सियाराम

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