भट्टा बैठालाती बी टीम
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
आज की सियासत में डूबते सियासी संगठनों के सामने सवाल कई हो सकते है मगर फिलहाल चर्चा कांग्रेस जैसे संगठन को लेकर सरगर्म है। एक ओर जहां ए टीम है तो दूसरी ओर बी टीम में डुबाने उछालने की होड मची है अब ऐसे में कांग्रेस के अंदर का सच और तथाकथित मैनेजरों की पहुंच का सच क्या है यह तो कांग्रेसी ही जाने। मगर जिस संभावना को आज से 20 वर्ष पूर्व म.प्र. सरकार के मंत्री स्व. दाऊ हनुमंत सिंह और पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री स्व. अर्जुन सिंह को कांग्रेस संगठन की दशा और दिशा को लेकर चेताया था मगर दुर्भाग्य कि कुछ हो न सका। मगर जो तथाकथित मैनेजर आज सियासी सलाह परोसत स्वयं सिद्ध होना चाहते है वह कांग्रेस में आज भी एक सवाल बने हुए है। जहां तक कांग्रेस की ए और बी टीम का सवाल है तो उसके दिग दर्शन राष्ट्रीय स्तर पर भले ही न हो। मगर म.प्र. में लोगों को स्पष्ट नजर आते है। जिस तरह से पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ भगवान राम की आस्था और सत्ता में रही कांग्रेस के निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन को लेकर मीडिया के बीच मुखर है और जिस हिन्दू आस्था और आस्था के प्रतीकों पर वह आस्था रखने वालों के पक्षधर दिखाई देते है निश्चित ही वह उस सत्य को स्वीकार्य कर और सियासत को आगे ले जाना चाहते है जिसके लिए कांग्रेस दो दशक से दो चार होती रही। तो वहीं दूसरी ओर म.प्र के ही पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह है जो कोई न कोई सियासी सवाल खडा कर वैचारिक रूप से कांग्रेस को कठघरे में खडा कर विपक्ष को हमलावर होने का मौका देते नहीं चूकते। अगर सियासी पंडितों की माने तो यह कांग्रेस की वह बी टीम है जिसमें म.प्र. ही नहीं देशभर के राज्यों में नेता और केन्द्रीय संगठन में भी भाषण वीर नेता भरे पडे है। बहरहाल मामला कांग्रेस का है और तथाकथित मैनेजरों से घिरी कांग्रेस को घर सुधार का निर्णय लेना भी कांग्रेस का काम है जो वह विगत 20 वर्षो से लेने में अक्षम, असफल सिद्ध हुई है अब जबकि समूची कांग्रेस के कर्ताधर्ता यहां तक कि स्वयं आलाकमान विधि सम्वत सवालों से घिर चुके है। ऐसे में विधि सम्वत सवालों से दूर लोगों की समीक्षा कांग्रेस को अवश्य करना चाहिए। मगर तथाकथित मैनेजरों की जकड में कोई भी निर्णय ले, कांग्रेस शायद ही वह विगत ऐसा कुछ कर पाये जो वह 20 वर्ष में नहीं कर सकी।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
आज की सियासत में डूबते सियासी संगठनों के सामने सवाल कई हो सकते है मगर फिलहाल चर्चा कांग्रेस जैसे संगठन को लेकर सरगर्म है। एक ओर जहां ए टीम है तो दूसरी ओर बी टीम में डुबाने उछालने की होड मची है अब ऐसे में कांग्रेस के अंदर का सच और तथाकथित मैनेजरों की पहुंच का सच क्या है यह तो कांग्रेसी ही जाने। मगर जिस संभावना को आज से 20 वर्ष पूर्व म.प्र. सरकार के मंत्री स्व. दाऊ हनुमंत सिंह और पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री स्व. अर्जुन सिंह को कांग्रेस संगठन की दशा और दिशा को लेकर चेताया था मगर दुर्भाग्य कि कुछ हो न सका। मगर जो तथाकथित मैनेजर आज सियासी सलाह परोसत स्वयं सिद्ध होना चाहते है वह कांग्रेस में आज भी एक सवाल बने हुए है। जहां तक कांग्रेस की ए और बी टीम का सवाल है तो उसके दिग दर्शन राष्ट्रीय स्तर पर भले ही न हो। मगर म.प्र. में लोगों को स्पष्ट नजर आते है। जिस तरह से पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ भगवान राम की आस्था और सत्ता में रही कांग्रेस के निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन को लेकर मीडिया के बीच मुखर है और जिस हिन्दू आस्था और आस्था के प्रतीकों पर वह आस्था रखने वालों के पक्षधर दिखाई देते है निश्चित ही वह उस सत्य को स्वीकार्य कर और सियासत को आगे ले जाना चाहते है जिसके लिए कांग्रेस दो दशक से दो चार होती रही। तो वहीं दूसरी ओर म.प्र के ही पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह है जो कोई न कोई सियासी सवाल खडा कर वैचारिक रूप से कांग्रेस को कठघरे में खडा कर विपक्ष को हमलावर होने का मौका देते नहीं चूकते। अगर सियासी पंडितों की माने तो यह कांग्रेस की वह बी टीम है जिसमें म.प्र. ही नहीं देशभर के राज्यों में नेता और केन्द्रीय संगठन में भी भाषण वीर नेता भरे पडे है। बहरहाल मामला कांग्रेस का है और तथाकथित मैनेजरों से घिरी कांग्रेस को घर सुधार का निर्णय लेना भी कांग्रेस का काम है जो वह विगत 20 वर्षो से लेने में अक्षम, असफल सिद्ध हुई है अब जबकि समूची कांग्रेस के कर्ताधर्ता यहां तक कि स्वयं आलाकमान विधि सम्वत सवालों से घिर चुके है। ऐसे में विधि सम्वत सवालों से दूर लोगों की समीक्षा कांग्रेस को अवश्य करना चाहिए। मगर तथाकथित मैनेजरों की जकड में कोई भी निर्णय ले, कांग्रेस शायद ही वह विगत ऐसा कुछ कर पाये जो वह 20 वर्ष में नहीं कर सकी।
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