सस्ती लोकप्रियता और वोट बैंक के मोह में स्वाहा होती स्थापित व्यवस्था निदान का भले ही नामों-निशान न हो, मगर नैन-सुखों की सियासत में कोई कमी नहीं

वीरेन्द्र शर्मा

विलेज टाइम्स समाचार सेवा।

अगर विगत डेढ दशक ही नहीं, पूरे दो दशक के सत्ता और सिस्टम के उत्तरदायित्वों की बात करें तो जिस तरह से स्थापित व्यवस्था और शासन के मूल कत्र्तव्यों का सत्यानाश सस्ती लोकप्रियता हासिल कर वोट कबाडने को लेकर हुआ है वह किसी से छिपा नहीं। अगर यो कहें कि सक्षम सामर्थशालियों का सर्वकल्याण में वह पुरूषार्थ स्वयं के स्वार्थो के आगे शेष नहीं रहा, तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। भाई लोग देश के नौकरशाही को भले ही बगैर किसी अपराध के उन्हें मुंह भरकर कोसे या उनके माथे आरोपों की कालिख मले, मगर जब भी कभी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सर्वकल्याण में निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन को लेकर संज्ञान लिया जायेगा, तो वह निर्दोष ही साबित होंगें। कारण कि न तो हम समय से कल्याणकारी, समृद्धशाली शिक्षा पद्धति ही शुरू कर पाये और न ही ऐसे प्रशिक्षण संस्थान और उनकी विशेष वस्तु तैयार कर पाये जो उनके स्थापित स्वभाव को सर्वकल्याणकारी सिद्ध कर पाता। क्योंकि तीन दशक से नैतिक रूप से सियासी गलियारों में सत्ता को लेकर जो तूफान उठा उसने सियासत, सत्ता, सेवा कल्याण ही नहीं पद गरिमा के भी अघोषित रूप से मायने ही पलटकर रख दिये। अब इसे लोकतंत्र की खामी कहे या स्वार्थवत कत्र्तव्य विमुख दलों के नाम प्रायवेट-लिमिटेड, लिमिटेड गिरोहबंद समूहों का स्वार्थवत, स्वकल्याण या फिर सर्वकल्याण। ये सही है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रमाणिक रूप से इन बातों की सिद्धता संभव न हो। मगर इसकी स्वीकार्ययोग्यती इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र के रास्ते आज हम इस मुकाम तक जा पहुंचे, जहां न तो अब नैतिकता बची है, न ही सर्वकल्याण का भाव। 

ये अलग बात है कि कुछ लोग सोशल कैमिस्ट्री के सहारे सिद्धता को सार्थक करने दृढ संकल्पित है मगर जिस संवेदनशीलता की दरकार किसी भी बदलाव में सार्थक होने की शर्त होती है लगता है वह उसके उलट साबित हो रही है। अगर यो कहें कि आज जो सियासी दौर लोगों की मजबूरी बनने आतुर है वहीं सियासत अब सर चढकर परवान हो रही है। जिसके लिये अगर यो कहें कि सिर्फ सत्तायें ही दोषी है तो यह एक अस्वीकार्य बात हो सकती है। इसके लिये वाक्य में ही सत्तायें ही दोषी होती है। क्योंकि सत्ता का धर्म लोगों के जीवन रक्षा के साथ उनके जीवन को समृद्ध खुशहाल बनाना होता है। जिसमें समाज और समूह, परिवार, व्यक्तियों की अहम भूमिका होती है। मगर शासन सत्ता का ही रहता। अगर किसी भी क्षेत्र में फिर चाहे वह सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक, सास्कृतिक एवं शिक्षा क्षेत्र हो या सियासत का क्षेत्र। जो सत्तायें सर्वमान्य जीवन मूल्य सिद्धान्त और मानव धर्म की रक्षा को सुनिश्चित कर नीतियां बना उनका क्रियावयन सुनिश्चित करती है तो ऐसे में उन स्वार्थी और मानव धर्म के विरूद्ध काम करने वाले लोगों को प्रचय नहीं मिल पाता और सत्तायें अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन में हमेशा सार्थक सिद्ध होती है। मगर लगता नहीं कि इतनी जल्द बहुत कुछ सुधरने वाला है। क्योंकि हालात और संभावित परिणाम फिलहाल इसकी इजाजत नहीं देते। कारण साफ है कि जिस आजादी के नाम पर सरेयाम सर्वमान्य सिद्धान्तों और सत्ता नीतियों की धज्जियां स्वार्थवत लोगों द्वारा उडाई जाती है वहां निश्चित ही समृद्धि सर्वकल्याण दूर की कोणी बना रहता है। 

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