अपनो के बीच वेसुध वैभवपूर्ण विरासत चुनावी वर्ष में शताब्दी वर्ष पर सवाल करते सरोकार
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस सेवा, कल्याण को साक्षी मान जिस सिद्धदत से सियासी रास्तों का मार्ग पूर्व सिंधिया स्टेट की महारानी कै. श्रीमंत राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने तय किया और जिस मुकाम तक वह सेवा कल्याण के संदेश को लेकर समूचे देश को परिचित कराने में सार्थक सफल हुई उन्हीं का 2020 वर्ष शताब्दी वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। मगर जिस तरह से उन्हीं की पार्टी और सरकारें सेवा कल्याण और निष्ठा के उनके पवित्र संदेश को देने में अक्षम, असफल साबित हो रही है वह आजकल चर्चा का विषय है। जिस सेवा कल्याण के भाव को बगैर किसी अपेक्षा के जीवन पर्यन्त स्थापित करने में श्रीमंत राजमाता सफल रहीं, फिर वह टाॅप-टू वाॅटम उनका दल हो, जिसको खडा करने उन्होंने सेवा कल्याण की खातिर दिन रात एक ही नहीं वह देश की सबसे सशक्त पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा गांधी तक से टकराने से नहीं चूंकि और जब आयोध्या मामले की जांच कर रहे आयोग के सामने लोग उस आंदोलन से अपनी दूरी बनाने के संकेत देते नहीं थकते थे तब वरिष्ठ नेताओं में सिर्फ राजमाता विजयाराजे सिंधिया ही ऐसी प्रखर नेता थी जिन्होंने कैमरे के सामने यह स्वीकार्य किया कि उनकी भगवान राम में गहरी आस्था है और वो चाहती है कि भगवान की स्थापना मंदिर में हो। आज जब उनका शताब्दी वर्ष चल रहा है ऐसे में उनके जीवन संघर्ष और उनके द्वारा स्थापित संस्कारिक संवेदनशील सेवा कल्याण की राजनीति की चर्चा न हो, तो सवाल होना तो स्वभाविक है। देखना होगा कि जिस दल को खडे करने तथा जिन लोगों की सेवा करने कै. राजमाता महल के गौरव-वैभव को त्याग सेवा कल्याण के लिये सडक पर संघर्ष का रास्ता इक्तियार किया आखिर वह लोग कब इस शताब्दी वर्ष में उनकी सुध ले पाते है।

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