सर्वमान्य विधि के विधान पर विधि सम्वतों के बीच सडक पर बबाल शर्मनाक स्वयं के नैसर्गिक विधान को त्याग अंगीकार विधान के विरूद्ध आचरण पर उठते संगीन सवाल सुशांत की मौत पर सुलगते जघन्य सवाल
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
अब जब अंगीकार विधान का राज हो और विधि सम्वत लोग विधि के नाम पर बैवस बेहाल हो, तो सुशांत की मौत पर सुलगते सवाल उठना तो स्वभाविक है। फिलहाल देश के दो बडे राज्य महाराष्ट्र और बिहार के बीच अपनी-अपनी निष्ठापूर्ण कृतज्ञता को लेकर कत्र्तव्य निर्वहन के हाल बेहाल हो तो फिर सवाल भी किससे और कैसे किये जाये। आज लोकतंत्र का सबसे यक्ष सवाल यहीं है कि जिस मौत और न्याय को लेकर दो राज्यों की पुलिस के बीच विधि सम्वत अधिकारों को लेकर सवाल है उसका सच भले ही भविष्य में सिद्ध हो। मगर विधि सम्वत संस्थाओं के बीच विधि को लेकर खिंची बयानों की तलवारें लोकतंत्र और विधि दोनों के लिए खतरनाक है। इस संशय विवाद में सबसे शर्मनाक बात उस पद प्रतिष्ठा को लेकर है जिसे समूचा देश आईपीएस जैसे सम्मानजनक विधि सम्वत नाम से जाना जाता है और उसकी पहचान एक ऐसे पद के रूप में होती है जिसे सीधे तौर पर संविधान की विधि में संरक्षण प्राप्त होता है। जिसे भारत की जनता जनसेवा, राष्ट्रभक्ति के नाम से भी जानती पहचानती है। बेहतर हो कि संवैधानिक शपथ लें राष्ट्र-जनसेवा का संकल्प लेने वाले इस विवाद की गंभीरता को समझे, बरना पुरानी कहावत है कि व्यवस्था जो भी हो बंद मुठ्ठी लाख की और खुल गई तो खाक की। सोशल मीडिया क्रान्ति के दौर में इस समझ को समझना आवश्यक है। कहीं ऐसा न हो कि आस्थायें इस अडी बाजी में अहंकार का शिकार हो। दिग भ्रमित हो न्याय की जगह अन्याय न कर बैठे।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
अब जब अंगीकार विधान का राज हो और विधि सम्वत लोग विधि के नाम पर बैवस बेहाल हो, तो सुशांत की मौत पर सुलगते सवाल उठना तो स्वभाविक है। फिलहाल देश के दो बडे राज्य महाराष्ट्र और बिहार के बीच अपनी-अपनी निष्ठापूर्ण कृतज्ञता को लेकर कत्र्तव्य निर्वहन के हाल बेहाल हो तो फिर सवाल भी किससे और कैसे किये जाये। आज लोकतंत्र का सबसे यक्ष सवाल यहीं है कि जिस मौत और न्याय को लेकर दो राज्यों की पुलिस के बीच विधि सम्वत अधिकारों को लेकर सवाल है उसका सच भले ही भविष्य में सिद्ध हो। मगर विधि सम्वत संस्थाओं के बीच विधि को लेकर खिंची बयानों की तलवारें लोकतंत्र और विधि दोनों के लिए खतरनाक है। इस संशय विवाद में सबसे शर्मनाक बात उस पद प्रतिष्ठा को लेकर है जिसे समूचा देश आईपीएस जैसे सम्मानजनक विधि सम्वत नाम से जाना जाता है और उसकी पहचान एक ऐसे पद के रूप में होती है जिसे सीधे तौर पर संविधान की विधि में संरक्षण प्राप्त होता है। जिसे भारत की जनता जनसेवा, राष्ट्रभक्ति के नाम से भी जानती पहचानती है। बेहतर हो कि संवैधानिक शपथ लें राष्ट्र-जनसेवा का संकल्प लेने वाले इस विवाद की गंभीरता को समझे, बरना पुरानी कहावत है कि व्यवस्था जो भी हो बंद मुठ्ठी लाख की और खुल गई तो खाक की। सोशल मीडिया क्रान्ति के दौर में इस समझ को समझना आवश्यक है। कहीं ऐसा न हो कि आस्थायें इस अडी बाजी में अहंकार का शिकार हो। दिग भ्रमित हो न्याय की जगह अन्याय न कर बैठे।
Comments
Post a Comment