कत्र्तव्य विमुख सियासत से सहमी मानवता नैतिक पतन की पराकाष्ठा, लोकतंत्र पर भारी भीडतंत्र मानव धर्म की रक्षा सत्ता, सामर्थशालियों का धर्म

व्ही.एस.भुल्ले

विलेज टाइम्स समाचार सेवा।









मानव धर्म की रक्षा और उसका नैसर्गिक संरक्षण, सम्बर्धन सत्ता, सामर्थशालियों का धर्म और कर्म कहा गया है। मानव धर्म की रक्षा उसका संरक्षण सम्बर्धन के कत्र्तव्य स्वरूप इस महान भूभाग पर अनादिकाल से कठोर तपस्या, कडा त्याग तो दूसरी ओर अनगिनत कुर्बानियां और शहादत भी हुई है। मगर कभी कत्र्तव्य और मानव धर्म को सामर्थ, पुरूषार्थ, प्राकृतिक संपदा से समृद्ध इस वीर भूमि ने कभी कलंकित नहीं होने दिया। नैतिक कत्र्तव्य बोध की संस्कृति से समृद्ध इस महान भूमि का मानव हमेशा से ही समस्त जीव-जगत के कल्याण के लिए जीवन पर्यन्त संघर्षरत रहा है। मगर इस मानव ने मानवता की आन-वान और तथा स्वयं के स्वाभिमान से कभी समझौता नहीं किया। फिर कीमत जो भी चुकानी पडी हो। मगर आज उन्हीं महामानवों की पीढी के रूप में हम स्वयं को पाते है तो हमारा सर शर्म और लज्जा से स्वतः ही झुका नजर आता है। कारण जिस महान भूभाग पर आज भी हमारा महान गौवंश गौमाता के रूप में पूजा जाता है। जिस गौवंश की सेवा गीता उपदेश देने वाले प्रभु कृष्ण ने की जिस गौवंश का उस महान भूभाग पर जीवन निर्वहन का विधि सम्वत नैसर्गिक अधिकार जल, जंगल, जमीन पर था पहले तो उस महान पशुधन को उसके विधि सम्वत अधिकार से विधि की आड ने उसे वेदखल किया अब उन्हें सडकों पर वेमौत और गांवों में भूखे-प्यासे मरने छोड, उसका मजाक उडा नैतिक पतन की पराकाष्ठा का जो प्रमाण सत्ताओं ने प्रस्तुत किया है वह किसी भी सभ्य समाज और स्वयं मानवता को शर्मसार ही नहीं कलंकित करने काफी है। यूं तो आज तक मानव के ही आगे रोटी, कपडा, मकान का एक बडा सवाल रहा था जिसका निदान वह आभाव पूर्व जीवन के साथ अभी तक नहीं ढूंढ पाया और आज भी स्वयं मानव को राहत पैकेजों के सहारे ही गुजर-बसर करनी होती है। अब चूंकि खबर यह है कि वेजुबान गौवंश की र्दुदशा पर राहत पैकेज का जो नमूना लोगों के सामने आ रहा है वह समूची मानवता को भी शर्मसार करने काफी है। लगता है कि वर्तमान सत्ता सियासी नीतियों के चलते लोकतंत्र पर भीडतंत्र हावी हो चुका है। क्योंकि अब सत्ता का सारा सामर्थ पुरूषार्थ वोट तक सिमटकर रह गया है जो मानव ही नहीं मानव धर्म के मार्ग में विध्वंश के स्पष्ट संकेत है। अगर समय रहते सत्तायें और सियासी लोेग नहीं चेते और इस सत्य को नहीं समझे तो कहते है कि सृष्टि स्वयं इतनी सक्षम सामर्थशाली है जो संतुलन का मार्ग आज नहीं तो कल स्वतः खोज ही लेगी। तब मानव और मानवीय सभ्यता की स्थिति इस ब्राह्मण्ड में क्या होगी फिलहाल यह भविष्य के गर्भ में ही रहेगा। 

जय स्वराज

Comments

Popular posts from this blog

खण्ड खण्ड असतित्व का अखण्ड आधार

संविधान से विमुख सत्तायें, स्वराज में बड़ी बाधा सत्ताओं का सर्वोच्च समर्पण व आस्था अहम: व्ही.एस.भुल्ले

श्राफ भोगता समृद्ध भूभाग गौ-पालन सिर्फ आध्यात्म नहीं बल्कि मानव जीवन से जुडा सिद्धान्तः व्यवहारिक विज्ञान है अमृतदायिनी के निस्वार्थ, निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन, त्याग तपस्या का तिरस्कार, अपमान पडा भारी जघन्य अन्याय, अत्याचार का दंश भोगती भ्रमित मानव सभ्यता