विषम दौर में भ्रमित आशा-आकांक्षा प्रमाणिकता के आभाव में पाखंड बनते पालनहार

वीरेन्द्र शर्मा

विलेज टाइम्स समाचार सेवा।

जिस तरह से आजकल सियासी गलियारों में अपने-अपने स्वार्थ पूर्ति के लिये प्रमाणिकता के आधार में पाखंड का बाजार सजा है उससे लोकतंत्र की कमजोरी का लाभ उठा भले ही लोग अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध करने में सफल सिद्ध होते हो, मगर इससे समृद्ध सेवा कल्याण की कामना करना बैमानी ही साबित होगा। ये अलग बात है कि भूतो न भविष्यते सिर्फ उस आराध्य को छोडकर कोई पूर्ण नहीं जिसमें अपने-अपने तरीके से लोगों में आस्था है। मगर जब बात राष्ट्र की आती है तो राष्ट्र कोई न तो शब्द है और न ही कोई भूभाग, बल्कि कोई भी राष्ट्र उस राष्ट्र रहने वाले नागरिकों की आस्था और उनके त्याग से निर्मित होता है। जिसके अपने मूल्य सिद्धान्त और सर्वकल्याणकारी नीतियां होती है जिसके लिए उस राष्ट्र में रहने वाले हर नागरिक के मन मस्तिष्क में राष्ट्रीयता का भाव होना आवश्यक होता है। मगर जो स्वभाव स्वयं तक सीमित रह अपनो तक सीमित होने का और स्वयं कल्याण का भाव जीने का आदि हो जाता है उस राष्ट्र का कल्याण असंभव-सा दिखाई देता है। टोले, मजरे, जागिर, राज्य की विरासत से निकले हमारे राष्ट्रीय भाव आजादी के 70 वर्ष बाद भी हमारी पीढियां नहीं बदल सकी। आज यहीं हमारा सबसे बडा दुर्भाग्य है। मगर ऐसा नहीं कि हमारा राष्ट्र-राष्ट्रवादियों से बांझ रहा हो, बल्कि सैकडों वर्षो की त्याग-तपस्या, संघर्ष, कुर्बानियां इस बात ही गवा है कि वह राष्ट्रीयता का भाव हमारे जहन में रहा है और आज भी है। मगर उसकी संख्या सीमित है और आजादी का मजा लूटने वालों या फिर अपने-अपने स्वार्थ पूर्ण करने वालों की संख्या कुछ ज्यादा ही है। जिसके लिये विशुद्ध रूप से हमारी शिक्षा और संस्कार जिम्मेदार है जो हमें आक्रान्ताओं ने थोपे है। काश हम अपनी मूल संस्कृति और सांस्कृतिक भाव के साथ राष्ट्रीयता के भाव को जागृत कर एक ऐसा सशक्त समृद्ध खुशहाल राष्ट्र का निर्माण कर पाये जो हमारी हजारों वर्ष की पहचान रही है और हमारे सामर्थ, पुरूषार्थ की साक्षी।

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