कोरोनाकाल में मलाई कूटते माईबाप
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह से कोरोनाकाल के परिणाम लोगों के सामने आना शुरू हुए और निढाल लोगों का संघर्ष शुरू हुआ वह कब खत्म होगा फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। मगर आये दिन बढते कोरोना के आंकडों से आमजन की जान भले ही सांसत हो। मगर मलाई कूटने वाले पहलवानों की बांछे फिलहाल खिली हुई है। क्योंकि व्यवस्थाओं के भर्राटे में न तो कोई पूछने वाला, न ही कोई बताने वाला, ऐसे में गचागच चल रही व्यवस्थाओं पर अब धीरे-धीरे सवाल उठना ही शुरू हो चुके है। ये अलग बात है कि पीढा के बीच शोध का समय शायद किसी के पास हो, जब बडी-बडी महाशक्तियां, वैज्ञानिक कोरोना के टीके को लेकर ही चारों खाने चित पडे हो। ऐसे में व्यवस्था को लेकर मचे कोहराम में व्यवस्थाओं को लेकर सवाल स्वतः ही यक्ष हो जाते है। मगर कहते है कि अंधेर नगरी चैपट राजा की कहावत जब आमजन की चर्चाओं में ज्वलंत हो, तो संदेह होना स्वभाविक है। फिलहाल देखना होगा कि व्यवस्थाओं को लेकर उठ रहे सवाल किसी एक संस्था, विभाग, संगठन या व्यक्ति को लेकर नहीं, अगर अपुष्ट सूत्रों की माने तो जहां जिसका मौका लग रहा है वह सेवा कल्याण की पराकाष्ठा करने से पीछे नहीं हट रहा है। ऐसे में सत्य तो फिलहाल वर्तमान के गर्भ में फल फूल रहा है। भविष्य किस रूप में लोगों के सामने होगा इसकी फिलहाल तो प्रमाणों के आभावों में कल्पना ही की जा सकती है।

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