प्राकृतिक जीवन में आध्यात्म ज्ञान, विद्या, विज्ञान स्वतः सिद्ध है नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन जीवन का मूल आधार
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
सफल, समृद्ध खुशहाल जीवन की नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप अपनी-अपनी जीवन पद्धतियां और उनके सामर्थ, पुरूषार्थपूर्ण परिणाम हर जीवन में होते है। मगर मानव धर्म का मूल आधार समस्त जीव जगत की सेवा और सर्वकल्याण होता है। जिस पर मानव का अस्तित्व और आधार निर्भर करता है। देखा जाये तो जिस नई शिक्षा नीति के निर्माण पश्चात जिस तरह से बौद्धिक सियासी और सत्ता जगत में बहस और विचारों की व्याख्या बडी है। जिसमें यह सिद्ध करने की कोशिश है कि जिस शिक्षा नीति को पीएसआर सुबमर्णयम समिति के कस्तूरीरंगन समिति ने देश के 776 जिले 60600 ब्लाॅक और 2.5 लाख ग्राम पंचायतों, शिक्षकों, आम नागरिक से व्यापक विचार विमर्श पश्चात तैयार किया है वह निश्चित ही सुदृण, समृद्ध शसक्त और जीवन को खुशहाल बना, महान बौद्धिक, वैदिक, सांस्कृति विरासत को बचाने और उसे अधिक समृद्ध प्रमाणिक बनाने में समृद्ध और समर्थ होगी। इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि प्राकृतिक जीवन में मौजूद आध्यात्म, ज्ञान, विद्या, विज्ञान हर जीवन के लिए सार्थक और समर्थ है। जरूरत है कि विषय वस्तु तैयार करते वक्त अध्ययन प्रयोग और प्रशिक्षण इनका मूल आधार जीवन में बना रहे है यह मौजूद सत्ता के सार्थक सामर्थ और पुरूषार्थ का परिणाम है कि डेढ सौ वर्षो से उपनिवेशिक शिक्षा को ढोती हमारी पीढियां शारीरिक ही नहीं मानसिक रूप से भी अपनी मूल बौद्धिक कौशल समृद्धि खो, एक ऐसे व्यवहारिक वातावरण का शिकार हो चुकी थी। जिसमें समस्या-समाधान के बजाये समस्याओं का अंबार लगा रहता था। कहते है देर आये दुरूस्त आये, अगर सियासत से इतर पूर्ण निष्ठा ईमानदारी के साथ शिक्षा की विषय वस्तु और प्रशिक्षित शिक्षक आचार्य, संवाद प्रमुख और कौशल से जुडे प्रशिक्षकों को हम मौजूद पीडी को उपलब्ध करा सके, तो यह मानव जीवन की सबसे बडी उपलब्धि होगी और आज के समय में हर जबावदेह नागरिक के लिए यह समझने वाली बात होनी चाहिए।

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