बेरहम सत्ता बिलखते माई-बाप........तीरंदाज ?
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
भैया- अब मने कै बोल्यू काश मने भी ठीक से म्हारा विधान, संविधान पडा होता तो म्हारे को ये दिन न देखना पडा होता और सियासी जलसों की बैवसी में म्हारे माई-बापों का ये हाल न हुआ होता। विधान विरूद्ध जलसा और शिकार बेचारे म्हारे माई-बाप। आखिर कै गलती है कि म्हारी और म्हारे माई-बापों की जो म्हारे को कोरोना कहर का दंश भोगना पड रहा है। कोरोना कहर ने न तो म्हारे को कहीं का छोडा और न ही म्हारे माई-बापों को, कोई वैद्य विसारद, तो कोई विज्ञान का सहारा ले रहा है, तो कोई दादी-नानी के नुक्शों के भरोसे कोरोना से भीषण संघर्ष कर रहा है। माननीयों का क्या वह तो मंच से बेईमान, गद्दार, धोखेबाज नाम का ब्रांडेड बारूद फूंक सैकडो करोड के विकास सेवा, कल्याण के सुगूफे छोड चैपर में बैठ फुर हो लिये। भाया कै वाक्य में ही सत्ता इतनी क्रूर और सियासत इतनी बेरहम होती है आखिर सच क्या है ?
भैये- तने तो बावला शै, थारे साथ यहीं तो समस्या है कै थारे को मालूम कोणी लोकतंत्र को छोड शेष तंत्र की सत्ताओं का स्वरूप ईश्वर तुल्य माना गया है। मगर जब से अघोषित तौर पर लोकतंत्र का जनाजा क्या उठा भाई लोग छाती कूटने तरस लिये। विलाप करने वालो के गले तो मातम बनाने वालों की आंखे सूख ली और तुझे सियासी बारूद से सेवा कल्याण की गंध सूझ रही है।
भैया- तो क्या मने चुनाव चंदा पार्टी, गठन के पूर्व ही षडयंत्रकारी सियासत को बाॅक-आॅव्हर दें जाऊ और गुड-फील में मसगूल म्हारे लोक-तंत्र को कोरोना के बीच बिलखता छोड जाऊं। भाया मने चिन्ता म्हारे लोक और माननीयों की नहीं। म्हारे को चिन्ता तो म्हारे माई-बापों की है जिनके कंधों पर वैद्यानिक रूप से समूचे सेवा कल्याण का भार है। मैं जाडू कि म्हारे माई-बापों की इतनी त्याग-तपस्या और निष्ठापूर्ण विधान, संविधान के प्रति कत्र्तव्य निर्वहन के बाबजूद इतिहास में कालिख म्हारे माई-बापों की कृतज्ञता पर ही टिकने वाली है। फिर जिस कोरोना ने आज उन्हें घेरा है। उसका बेरहम निजाम म्हारे देश में ही नहीं, विश्व के कई देशों में अपना कहर बरपा रहा है और अपने क्रूर चेहरे से मानव जगत को अपने सामर्थ, पुरूषार्थ से नकुओं चने बिनवा रहा है। मने तो बोल्यू भाया इस कोरोना के कहर से अब न तो कोई निजाम बचा, न ही लोक सहित तंत्र, फिर इस मुये कोरोना का कोई पुख्ता इलाज भी तो आज तक, न तो कोई बलि, न ही महाबलि ढूंढ सका है, म्हारी तो सारी उम्मीद अब म्हारे बांकेबिहारी पर जा टिकी है।
भैये- ऊपर आडे से तो उम्मीद रखना कोई बुरी बात नहीं, मगर कर्म करना भी तो जरूरी है। मगर थारी उम्मीद में म्हारे को जरा, शक लागे। जिन बांकेबिहारी की सबसे प्रिय गौमाता आज जिन्दा रहने आभावों के बीच सडकों पर भटक रही है, इतना जघन्य घोर पाप देखकर भी क्या बांकेबिहारी थारी सुनेंगें।
भैया- मने समझ लिया थारा इशारा, मुई सियासत, सत्ता होती ही इतनी क्रूर है, बरना गौवंश तो अपने हक का जल, जंगल, जमीन छोड आज भी जिन्दा खडी है, तो वहीं मायानगरी में कोरोनाकाल के बीच कंगना और सत्ता के बीच जबरदस्त ठनी है, तो वहीं एलओसी पर तूफान उठा है, भगवान जाडे सत्ता और सियासत को मानव धर्म की खातिर न जाडे, क्या-क्या करना पड रिया शै। सत्ता के लिए सजते जलसों में म्हारे माई-बापों को कोरोना न मिला होता, तो आज म्हारा शहर भी कोरोना से जबरदस्त जंग कर रहा होता। म्हारी तो अब प्रभु से एक ही गुजारिश है कि बगैर व्यावधान के विधान की रक्षा करने वाले माई-बापों को जल्द से जल्द इस कोरोना से मुक्ति मिल जाये और उनके स्वस्थ जीवन की कामना हाथों-हाथ पूर्ण हो जाये। इतने पर तो उडती सियासी बारूद में लोग और तंत्र की गाडी चल जायेगी बरना फिर किसी चैराहे पर कोरोना चैक पोस्ट के सामने बैवस खडी नजर आयेगी, जहां न तो सत्ता, सियासत, न ही लोक और जन सहित माई-बापों की सुनी जायेगी, सिर्फ सोशल डिस्टेंस के साथ मुंह पर मास्क लगा दादी-नानी के नुक्शों की औषधि ही कोरोना से बचने काम कर पायेगी।

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