मानव धर्म की सार्थकता सिद्ध करता स्वराज, जन्मदिन की बधाई प्रमाणिक पुरूषार्थ और संवेदनशीलता की पराकाष्ठा राष्ट्र-जन मानव धर्म को समर्पित प्रमाणिक पुरूषार्थ
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
अगर संतुलन सृष्टि का नैसर्गिक सिद्धान्त है तो मानव धर्म की रक्षा मानव का नैसर्गिक कत्र्तव्य और निष्ठापूर्ण पुरूषार्थ की प्रमाणिकता सिद्ध करती उस सामर्थ की सवंदेनशीलता है।
कहते है सृष्टि सृजन में जीवन की सार्थकता, सिद्धता सिद्ध करने जब भी पुरूषार्थ होता है तो हलचल होना स्वभाविक है। मगर उस सामर्थ पुरूषार्थ का लक्ष्य जब मानव धर्म की रक्षा और मानव सहित जीव जगत का सर्वकल्याण हो, तो सवाल होना स्वभाविक है। मगर जो मानव अपनी मानवीय कृतज्ञता सर्वकल्याण में सिद्ध करने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करता है वह उस मानव के महामानव जीवन में होने का अधिकार सिद्ध करता है फिर वह कत्र्तव्य व्यक्तिगत हो या फिर संस्थागत, संगठनात्मक सामूहिक हो।
आज जिस तरह से एक महान विरासत सशक्त नेतृत्व में आंतरिक और बाह्य सुरक्षा नीति सहित सत्तागत सियासी तौर पर मानव के सार्थक सर्वकल्याण की ओर सभी स्तरों पर प्रयासरत है और जो मजबूत नींव निर्माण के साथ एक समृद्ध सशक्त, खुशहाल समाज राष्ट्र निर्माण का कार्य शुरू हुआ है इससे दो कदम आगे जो व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र में आत्मनिर्भरता तथा स्वाभिमान का भाव पैदा हुआ है उसके भावी परिणाम इस राष्ट्र की महान विरासत के दिव्य-भव्य स्वरूप के अवश्य साक्षी होगें। मगर कोलाहल के बीच अनुतरित सवालों को सवाल करने से पूर्व समझना होगा कि अभी तो गौरव, वैभव समृद्धि खुशहाली के लिए मंथन शुरू हुआ है। अगर इसमें निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन हुआ तो कोई कारण नहीं जो मानव धर्म की रक्षा और सर्वकल्याण का भाव सिद्ध न हो। मौजूद नेतृत्व की प्रमाणिकता ये है कि उच्च संस्थानों से भ्रष्टाचार अब लगभग विधा ले रहा है। राष्ट्र अब राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय स्तर पर एक महाशक्ति बनकर उभर रहा है। वहीं एक बडा वर्ग शिक्षा, स्वास्थ्य, इनोवेशन के मार्ग पर आगे बढ रहा है। सेवा कल्याण के क्षेत्र में नये-नये इनोवेशन के माध्यम से देश की प्रतिभाओं को कई क्षेत्रों में प्रदर्शन का मौका बढ रहा है। कहते है समृद्धि, संस्कारी, कल्याणकारी न हो और संस्कारों का अपनी संस्कृति से दूर-दूर तक का वास्ता न हो, तो ऐसी संस्कृति, संस्कार न तो स्वयं, न ही मानव धर्म की रक्षा करने में सक्षम होते है, न ही ऐसे संस्कार, संस्कृति मानव का अस्तित्व सुरक्षित रख, उसे संरक्षित कर पाते है। जब भी कोई बडा बदलाव होता है तो विभिन्न स्तरों पर दर्द, पीडा होना स्वभाविक है। मगर दर्द, पीडा ही वह मार्ग होता है जो सामर्थ पुरूषार्थ की सिद्धता, सिद्ध करता है। आज राष्ट्र और जन के लिए यहीं समझने वाली बात होना चाहिए। क्योंकि जिस निष्ठा से प्रधानमंत्री के नेतृत्व में राष्ट्र-जन और राष्ट्र-जन कल्याण तथा भारतवर्ष की वैभवपूर्ण विरासत को पुनः उसका खोया गौरव, वैभव लौटाने का दिन-रात पुरूषार्थ हो रहा है। उसके परिणाम कुछ लोगों को भले ही स्पष्ट नजर न आये और सुधार का तरीका लोग अंगीकार न कर पाये। मगर कहते है किसी भी विचार का अपना आधार होता है। मगर हर विचार में राष्ट्र-जन सर्वकल्याण का भाव और मानव धर्म की रक्षा की कृतज्ञता का भाव छिपा रहता है।
जय स्वराज

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