लोकतंत्र में जन, जीव, सेवा, सत्ता, सरकारें, किसी भी विशेष, दल, नेता स्वार्थवत गैंग, गिरोहबंद लोंगों की बपौती नहीं स्वयं और सर्वकल्याण सहित मानव धर्म की रक्षा के लिए समर्थ, समृद्ध नागरिकों को अपने नैसर्गिक कत्र्तव्य निर्वहन की खातिर आगे आना चाहिए जिस भविष्य और अपने बच्चों के सुनहरे कल के लिए आज हम कत्र्तव्य विमुख हो स्वार्थवत है और सबकुछ जानते-बूझते, अंधंे-बेहरे होने की मुद्रा में है संभव है कि हम भी कभी इसके दुष्परिणामों के भागीदार बन इन्हें भोगने मजबूर हो

 व्ही.एस.भुल्ले

विलेज टाइम्स समाचार सेवा।

मुखिया, नेता, नेतृत्व वह होता है जिसमें सबका संरक्षण, सुरक्षा, सम्बर्धन और सर्वकल्याण का भाव निहित हो, जिसे हम मानव, धर्म भी कहते है जिसकी रक्षा के लिये कभी प्रभु राम और रावण के बीच युद्ध और महाभारत के दौरान बडे-बडे महाबलियों का घोर विनाश इस पृथ्वी पर हुआ और समयकाल परिस्थिति अनुसार जब-जब मानव धर्म की हानि या मानव धर्म पर अंधा अहंकार भारी हुआ तब-तब समूचे मानव जीव-जगत को इसके दुष्परिणामों का साक्षी होना पडा। मगर जब आज हम लोकतांत्रिक व्यवस्था में है और आमजन के मत की सहमति से अपने समृद्ध खुशहाल जीवन के लिए जनप्रतिनिधियों का चुनाव करते है या संगठित हो, सेवा, कल्याण की खातिर सत्ता और सरकारों तक पहुंचने उचित साधनों के माध्यम से उत्तम साध्य प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होते है, तो ऐसे प्रयासों के परिणाम हमेशा से ही कल्याणकारी रहे है। मगर जिस तरह से किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में दल, संगठन, गैंग, गिरोह, बंद समूह या व्यक्ति लोगों का मत अपने पक्ष में हासिल करने त्याग-तपस्वी पुण्य आत्माओं या महामानवों की कृतज्ञता का सहारा लें या विधा विद्यवान और चमत्कारिक नेतृत्वों का वास्ता दें, सर्वकल्याण से इतर स्वकल्याण की खातिर सत्ता, सरकारों तक पहुंचने की कोशिश सेवा कल्याण के नाम उचित, अनुसूचित मार्गों से करते है। ऐसे में मानव, जीव, जगत कल्याण में आस्था और जीवन की समृद्धि, खुशहाली में विश्वास रखने वालों को आज यह समझने वाली बात होना चाहिए। क्योंकि संतुलन ही सृष्टि-सृजन का आधार है। मगर अच्छे बुरे का संतुलन बनाये रखने का सबसे बडा योगदान उस मानव और मानव जगत का होता है जिसके कंधों पर समस्त जीव जगत के कल्याण का भार होता है। यूं तो कई दशकों की लोकतांत्रिक व्यवस्था के बीच न जाने कितनी पीडियां अपने मूल कत्र्तव्य के मार्ग पर जीवन निर्वहन निष्ठापूर्ण करती रहीं और भविष्य में भी करेंगी। लेकिन जब तक आम मानव के बीच स्वकल्याण से इतर सर्वकल्याण का अहिंसक भाव जाग्रत नहीं होता तब तक हम उस कत्र्तव्य को निष्ठापूर्ण नहीं कह सकते। बेहतर हो कि मानव होने के नाते हर व्यक्ति, समाज की यह जबावदेही होती है कि वह यह सुनिश्चित करें कि व्यवस्था में ऐसे लोग सत्ता, सरकारों तक न पहुंच सके, जिनका भाव सर्वकल्याण से इतर स्वकल्याण हो। शक्तिशाली, सामर्थवान, समृद्ध होना हर मानव का लक्ष्य होना चाहिए। क्योंकि प्रकृति तो अपनी अहिंसा और संतुलन के आभाव में उपजी हिंसा से स्वयं को संतुलित कर लेती है। मगर इस सृष्टि में मानव ही एक ऐसा जीव है जिससे शेष मानव और स्वयं प्रकृति को उसके नैसर्गिक, निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन से सर्वकल्याण की उम्मीद होती है। जिससे जीवन, समृद्ध, खुशहाल होने के साथ सृष्टि, सृजन में अपना निष्ठापूर्ण योगदान दे सके। मगर यह तभी संभव है जब हम व्यवहारिक सत्य को साक्षी मान उन सिद्धान्तांे को आत्मसात कर सके जिन व्यवहार सिद्धान्तों के आधार पर जिन लोगों ने मानव जीवन में रहने के बावजूद स्वयं के महामानव होने की सिद्धता हासिल की। आज जब समय है तो ऐसे यक्ष सवालों पर सवाल-जबाव भी होना चाहिए और समाधानों पर विचार भी। तभी हम एक समृद्ध खुशहाल व्यवस्था, समाज और राष्ट्र का निर्माण करने में सफल होंगे जो हमें आत्मनिर्भर भाव के माध्यम से सिद्ध होगा।   

जय स्वराज

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