जीत के मंसूबों पर आखिर कब संज्ञान लेगी जनता उपचुनाव की तैयारियों के बीच वोट कबाडुओं की थीम तैयार

व्ही.एस.भुल्ले

विलेज टाइम्स समाचार सेवा।

यूं तो देश में विगत 70 वर्षो से चुनाव उपचुनाव होते आ रहे है। जहां यह चुनाव सेवा कल्याण और विकास के लिये त्रिस्तरीय या दो स्तरीय होते चले आ रहे है जिसमें हर स्तर के सेवक और सरकार को जनसेवा कल्याण का संविधान अनुसार निर्धारित समय सीमा में मौका मिलता रहा है। मगर दुर्भाग्य कि अनियंत्रित सेवा कल्याण और संपन्नता मंे वह मुकाम स्थापित नहीं हो सका जिस पर आम आदमी गर्व कर स्वयं के द्वारा स्थापित व्यवस्था में गौरान्वित कर पाता। जिसका मूल कारण हमारी भूलने की आदत और कमजोर याददाश्त है नहीं तो आज हम अपने पूर्वजों की महान विद्या, ज्ञान, युक्त विरासत और उनके बलिदान से अनभिज्ञ हो, समृद्धि, खुशहाली के लिये नहीं भटक रहे होते। लगता है पाश्चात संस्कृति और भौतिकवाद की अंधी दौड में हम अपना मान-सम्मान, स्वाभिमान ही नहीं अपनी पहचान खो चुके है। आज जब हम अपने आपको सबसे युवा देश होने पर गर्व से फूले नहीं समाते। ऐसे में आखिर हमारा गर्म खून और तीक्षण बुद्धि क्यों कुंद पडी है। क्यों वह सामर्थ, पुरूषार्थ अपने स्वच्छंद प्रदर्शन का मोहताज है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह देश उन लाल-बाल, पाल के स्वाभिमान संकल्प का देश है। शिवाजी, भगत, खुदीराम, सुभाषचन्द्र बोस और पं. चन्द्रशेखर आजाद का देश है। यह देश उस महान व्यक्तित्व का है जिसने सिर्फ एक लाठी-लंगोटी के सहारे ब्रतानियां हुकूमत की जडे हिलाकर रख दी थी। आखिर यह हमारी उस भूल का परिणाम है जिसे हमने पाश्चात संस्कृति और भौतिक सुख सुविधाओं की लालसा में अपने उन महान बलिदानी विद्यवान, ज्ञान-वान, पुरूषार्थ और संपदा से समृद्ध विरासत को भुला दिया। उसी का परिणाम है कि हम विगत 70 वर्षो से वोट लेने और देने के खेल में अपने किसी भी नागरिकों को नैसर्गिक आवश्यकताऐं जल, भोजन, बिजली, सडक, स्वास्थ्य और विद्या तक उपलब्घ नहीं करा सके और न ही हम स्वच्छंद वातावरण निर्माण कर सके। दर्द और दुख की बात तो यह है कि समूची व्यवस्था को ढोने गाढे पसीने की कमाई और हर चुनाव में वोट देने के बावजूद भी हम अपने नैसर्गिक अधिकार से वंचित होते रहे। कहते है चुनाव में सियासी दल उसके नेतृत्व और सरकारें श्रवण मूड में होती है। मगर हमारी चुप्पी ने हमें कहीं का नहीं छोडा। बेहतर हो कि हम अपने भूत, वर्तमान से सीख लेते हुए बेहतर भविष्य के लिए संकल्प लें, वोट मांगने वालों से सवाल करने का क्रम शुरू करें और सटीक उत्तर तथा अपनी सेवा का प्रमाणिक प्रमाण देने वालों को ही अपना बहुमूल्य वोट देकर चुने। फिर भले ही उपचुनाव हो या मुख्य चुनाव यह बात आज के युवा को नहीं भूलना चाहिए और यह संदेश अपने मान-सम्मान, स्वाभिमान और पहचान को बचाने अवश्य समाज में देना चाहिए। जिससे चुनावों में अच्छे और सच्चे लोग जीत अपने को निष्ठ और कत्र्तव्य के प्रति सजग प्रतिनिधि के रूप में सिद्ध कर सके, न कि सेवा कल्याण की आड में स्वकल्याण के मंसूबों को पूरा करें। कहते है कि छोटी-सी सीख और अदना-सा सवाल बडी समझ और संकल्प सिद्धि में हमेशा सिद्ध रहे है इसलिये सवाल अवश्य होना चाहिए। 

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