क्या अहम मुद्दे होंगे उपचुनाव में ज्वलंत गौवंश की गुहार पर कब होगी पुकार
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
अपने नैसर्गिक अधिकार जल, जंगल, जमीन से हुये दरकिनार गौवंश की गुहार क्या इस उपचुनाव की पुकार बन पायेगी फिलहाल कहना मुश्किल है। क्योंकि आजादी से लेकर आज तक बेरोजगार हाथ जिस तरह से सक्षम रोजगार को भटकते-भटकते अक्षम हो, अपनी आशा-आकांक्षाओं पर आंसू बहाने बैवस, मजबूर है वह मुद्दा भी इस उपचुनाव में मुद्दा बन पायेगा, फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। यूं तो अधोरंचना निर्माण से लेकर मानव संसाधनों का आभाव कोई नई बात नहीं। मगर जीवोत्पार्जन के सहज सरल मध्यामों की दरकार जीवन को गांव, गली तक आज भी है। ये अलग बात है कि जिस भूभाग पर यह महान लोकतंत्र आत्मसात है जहां गौवंश की पूजा होती है आज वहीं गौवंश मानव और सियासी स्वार्थो के चलते अब कोई मुद्दा नहीं रह गया। जिस गौवंश ने मानव की कई पीढियों को अपने दूध, दही, छाछ, घी, मक्खन से सींच सैकडों हजारों वर्षो तक पोषित किया आज वहीं गौवंश अपने अधिकार की जमीन चरनोई, तालाब, पोखर, कुंआ, झरनों से प्राप्त पेयजल व जंगलों में उगने वाली घास जो उसका भोजन हुआ करता था जिसमें कुछ भूभाग वन क्षेत्र की मिलकीयत हो गया, तो चरनोई के रूप में मौजूद भूभाग दबंग और स्वार्थी मानसिकता का शिकार हो, अतिक्रमण की गोद में जा बैठा। जिस गौवंश को आज जल, जंगल, जमीन से वेदखली की सजा बगैर किसी अपराध की सजा मिली है हो सकता है इस उपचुनाव में भी वह वेजुबान अपनी बात वोट का अधिकार न होने के कारण न रख पाये। मगर बेकार हाथ सियासत के जिन मुद्दों को लेकर आज तक अपना मत देते आ रहे है और लोग लेते आ रहे है कहीं ऐसा न हो कि इस उपचुनाव में भी बगैर सवाल किये बेरोजगार का मत ऐसे जनप्रतिनिधियों मिल जाये जो आज तक न तो कुशल और न ही अकुशल न ही शिक्षित लोगों को रोजगार का अधिकार दें, उन्हें पर्याप्त रोजगार और संसाधन उपलब्ध करा पाये। ऐसे में वेवजह के मुद्दों से इतर अगर युवा, बुजुर्ग मतदाता वोट मांगने वाले लोगों की सेवा कल्याण और विकास की फैरिस्त तलाश कर सवालों के साथ मतदान करेंगे तो यह इस उपचुनाव की सार्थकता अवश्य होगी फिर जीत-हार जिसकी भी हो।

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