आत्महीन समाज की र्दुदशा अहंकार ने कहीं का नहीं छोडा महान विरासत को खून के आंसू रोने पर मजबूर मानव धर्म
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है किसी भी भव्य, दिव्य भवन इमारत का वैभव-गौरव बचाने में उसकी मजबूत नींव ही उसका आधार होती है। इसी प्रकार किसी भी राज्य, राष्ट्र का मजबूत आधार उसकी शिक्षा, संस्कृति, संस्कार के गारे से तैयार उन नागरिकों की फौज होती है जिसकी आस्था उसको जीवंत स्वरूप प्रदान करती है। जो परिवार, समाज, राज्य, राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोंकर उसे एक मजबूत आधार और आकार देते है। जिस पर समृद्ध, खुशहाल राष्ट्र की भव्य, दिव्य मीनार खडी होती है। मगर विगत तीन दशक अर्थात 35 वर्षो में जिस महान विरासत का सत्यानाश हुआ है जिसे कभी समूचे विश्व में जम्मूद्वीप आर्यवृत भरतखण्डे अर्थात भारतवर्ष के नाम से जाना जाता था और जिस पर हमारी पीढियां गर्व कर स्वयं को गौरान्वित मेहसूस करती नहीं थकती थी अब 35 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद एक मर्तवा फिर से जन और राष्ट्र की खातिर किसी नये बदलाव की सुगबुगाहट सुनाई दी है। ऐसे में दर्द और कष्ट का एहसास होना मानव जीवन को स्वभाविक है। जहां नैतिकता, सामाजिक सरोकार सभी चारों-खाने चित पडे हो और मानव धर्म खून के आंसू रोने पर मजबूर। ऐसे में कैसे मानव धर्म की रक्षा हो और कैसे मौजूद जीवन समृद्ध खुशहाल हो यह सबसे बडा यक्ष सवाल है। ये अलग बात है कि आगे का मार्ग डरावना कष्टप्रद हो सकता है। मगर चंद लोगों की मक्कारी और मानव धर्म से द्रोह की सजा उन निरीह जीवनों को नहीं मिलनी चाहिए जो स्वार्थ, अहंकार के अस्त्रों से लहु-लुहान हो, अभी तक अपने हकों और कत्र्तव्यों के अंग-भंग आत्महीन जीवन को जीते आये है। मगर यहां यक्ष बात यह है कि क्या उत्तम साध्य प्राप्ति में उत्तम साधनों का उपयोग हो रहा है। बैसे भी अहिंसा का अर्थ सिर्फ अन्याय सहना नहीं, बल्कि मानव धर्म की रक्षा में उठा अस्त्र भी अहिंसा की श्रेणी में ही माना गया है। मगर सेवा के शस्त्र स्वभाव को कभी कोई नहीं बदल सकता और न ही उसकी अचूक मारक क्षमता पर अविश्वास कर सकता। इसलिये संतुलन का सिद्धान्त लम्बे स्वस्थ समृद्ध खुशहाल जीवन का आधार कहा गया है यह मानव धर्म की स्थापना में जुटे किसी भी सामर्थ पुरूषार्थ को नहीं भूलना चाहिए। क्योंकि जल से जंगल और जल-जंगल से पशु-पक्षी, जीव-जन्तु, जानवर और मानव जीवन है। जिसकी रक्षा का भार हर उस मानव के कंधों पर होता है जिसकी गहन आस्था मानव धर्म में होती है। क्योंकि सृष्टि में मानव से अधिक त्याग, तपस्या, कुर्बानी, जल, जंगल, जीव-जन्तु, जानवर, पशु-पक्षी की जीवन को सुरक्षित रखने में रही है। अगर यो कहे कि इनके बिना जीवन किसी भी स्थिति में मानव के लिए संभव नहीं होगा, तो कोई अतिसंयोक्ति नहीं होगी। शायद यहीं सृष्टि का समूल संतुलन, सिद्धान्त है जिस पर हर मानव को विचार और मानव होने के नाते चिन्तन-मंथन अवश्य करना चाहिए।
जय स्वराज

Comments
Post a Comment