प्रधानमंत्री स्वनिधि से होगा आत्मनिर्भर पीडित, वंचित शेष भारत प्रधानमंत्री बतियाये लाभार्थियों से
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
निश्चित ही 9 सितम्बर का दिन आत्मनिर्भर भारत निर्माण के मार्ग में कितना सशक्त माध्यम सिद्ध होगा यह तो फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। मगर जिस तरह से देश के प्रधानमंत्री ने लाभार्थियों से चर्चा की और स्वनिधि योजनाओं को रेडी-पटरी और छोटा-मोटा धंधा कर जीवोत्पार्जन करने वाले शेष भारत अर्थात पीढित, वंचित आभावग्रस्तों के बीच रेखांकित किया कि स्वनिधि से क्या बदलाव आम जीवन में होगा। ये अलग बात है कि स्वनिधि योजना के परिणाम भले ही आज यथार्थ हो या फिर उनका भविष्य यथार्थताः कैसा होगा यह तो समय ही तय करेगा। मगर समृद्ध और संस्थागत माध्यमों से जीवोत्पार्जन करने वालों के अलावा सस्ते राशन और शासकीय योजनाओं के मोहताज लोगों के लिए सीधा लाभ पहुंचाने की दृष्टि से विभिन्न योजनाओं को जिस तरह से एक सूत्र में पिरो उनका जीवन खुशहाल बनाने का फाॅरमूला अपने उदबोधन में समस्त देशवासियों के सामने दिघदर्शित किया है वह राष्ट्र और जनों को समझने वाली बात होना चाहिए। जिस तरह से जनधन से लेकर बीमा, पेंशन, उज्जवला, आयुष्मान, एक देश एक कार्ड और लगभग 3 वर्ष में आॅप्टीकल फायबर से देश के सभी गांवों को जोड आॅनलाईन करने का संकल्प आवास, शौचालय से लेकर स्वनिधि के माध्यम से रोजगार का जो खाका आत्मनिर्भरता के मार्ग को मजबूत बनाने व किसानों को सीधे राहत पैकेज पहुंचाने के जो रास्ते तय हुये है। निश्चित ही एक मजबूत व्यवस्था और राहत के संकेत है। ऐसा नहीं कि आजादी के बाद देश में 70 वर्षो के दौरान योजनाऐं और पीडित, वंचितों को राहत पहुंचाने की शुरूआत न हुई हो। मगर जनधन खातों के माध्यम से जो प्रमाणिक शुरूआत 40 करोड जनधन खातों के माध्यम से सिद्ध होने की बात जो रही है उसकी सिद्धता में फिलहाल संदेह केन्द्र सरकार के अथक प्रयासों पर सवाल होगा। क्योंकि समूचे देश में इस सत्य से कोई भी मुंह नहीं मोड सकता कि किसी भी योजना, परियोजना की सफलता उसके क्रियान्वयन और संसाधनों पर निर्भर होती है और संसाधन तब तक सार्थक सिद्ध नहीं होते जब तक कि उनमें संवेदनशीलता न हो और संवेदनशीलता किसी भी सिस्टम में उस समाज से आती है जो समाज विद्या, ज्ञान से विधित होने के साथ सर्वकल्याण में आस्था और विश्वास के प्रति निष्ठ होते है। दुर्भाग्य कि हम विगत 70 वर्षो में ऐसे सिस्टम और संसाधनों के आदि और हामी हो चुके है। जिसमें संवेदनशीलता का भाव उतना सिद्ध नहीं हो सका जिसकी सर्वकल्याण के मार्ग में स्वतः अपेक्षा होती है। मगर कहते है देर आये दुरूस्त आये जिस तरह से शिक्षा नीति में परिवर्तन का जो अदम्य साहस तथा सियासी सुधार का जो सामर्थ मौजूद संगठन, संस्थाओं ने दिखाया है उसे फिलहाल सकारात्मक ही कहा जायेगा। मगर जिन चूक-भूल और गलतियों के कारण भारतवर्ष असंवेदनशील संस्कृति, संस्कारों से कालखंड अनुसार दो-चार होता रहा है उसके मूल में सत्ता व सियासी लोगों की सर्वकल्याण, राष्ट्र-जन कल्याण के लिये वहीं भाव रहा, जो आज की सियासत सत्ताओं में हावी होता प्रदर्शित होता है जो सर्वकल्याण के भाव में अनादिकाल से वर्जित रहा है और समयकाल परिस्थिति अनुसार संघर्ष का कारण भी रहा है। काश हमारा सभ्य सुसंस्कृत समाज इस सत्य को समझने और प्रमाणिक रूप से प्रमाणिकता सिद्ध करने प्रभु राम के मर्यादित जीवन और श्री कृष्ण के रूप में समृद्ध खुशहाल समाज निर्माण और न्याय व्यवस्था सहित मानव धर्म के अर्थो को समझ पाये। राष्ट्र और जन को प्रधानमंत्री स्वनिधि योजनाओं के शुभ अवसर पर आत्मनिर्भर और पीडित, वंचित लोगों के खुशहाल जीवन निर्माण का जो खाका सुनने मिला उस पर निश्चित रूप से संतोष करना चाहिए। अगर वाक्य में ही कुछ योजनाओं को पूरी संवेदनशीलता के साथ एक सूत्र में पिरो उन पर निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन का पुरूषार्थ हो तो कोई कारण नहीं कि गांव, गली से लेकर नगर, शहर, वन पर्यावरण और आर्थिक समृद्धि कुछ ही समय में राष्ट्र-जन ही नहीं समूचे विश्व के मानव जगत के सामने होगी।
जय स्वराज

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