नैतिक पतन की पराकाष्ठा में उलझा इंसान श्राफ से मुक्ति को छट-पटाता सुसंस्कृत, समृद्ध, खुशहाल भूभाग
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है कि जन्मदायनी जीवन भर पूज्यनीय, तो जीवनदायनी जन्म-जन्म तक पूज्यनीय मानी जाती है। मगर जिस सुसंस्कृत, समृद्ध भूभाग पर जीवनदायनी का खुलेयाम तिरस्कार, अपमान और उसके जीवन के साथ घोर अन्याय हो, ऐसे में नैतिक पतन की पराकाष्ठा होना तय है। अगर दूसरे शब्दों में कहे तो वर्तमान हालात इस तिरस्कार को देखते हुये श्राफ से मुक्ति को छटपटा रहे है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। यहां बात हम उस पशुधन की कर रहे है जो हमें दूध, दही, मक्खन, घी, पनीर के रूप में पौष्टिक भोजन देते है। जिससे जीवन स्वस्थ और अर्थव्यवस्था समृद्ध खुशहाल बनती है। ऐसे पशुधन के लिए उस महान भूभाग पर जिसकी विरासत अनादिकाल से सुसंस्कृत, समृद्ध, खुशहाल रही है वहां उन्हें उनके नैसर्गिक हक जल, जंगल, जमीन से वेदखल ही नहीं, जिन्दा मरने पर मजबूर करना घोर अन्याय और पाप ही कहा जायेगा। ऐसे श्राफित भूभाग पर समृद्धि खुशहाली की कल्पना बैमानी के अलावा और कुछ नहीं हो सकती। काश हम सभ्य समाज के कहे जाने वाले मानव इंसान, सत्ता, सरकार, संगठन इस सच को समझ पाये, तो यह मानव सभ्यता और इंसानियत की सबसे बडी उपलब्धि होगी।

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