माईबाप की हरकत से हलाकान लोकतंत्र के भगवान क्या वाक्य मे ही सत्ता इतनी अहंकारी होती है......?


व्ही. एस. भुल्ले

म.प्र. विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

म.प्र.-ये अलग बात है कि राजतंत्र परतंत्र के पतन के बाद हमने पूरे स्वाभिमान के साथ इस महान लोकतंत्र को अंगीकार कर गहरी आस्था रख आज तक सहर्ष स्वीकार करते चले आ रहै है अपने वोट,नोट से सत्ता को पोषित करने बालो को क्या पता कि सत्ता इतनी अंहकारी होती है कि जिसके चाकर स्वयं को माईबाप समझ लोकतंत्र के भगवानो हड़काने मे कतई गुरेज नही करते और उनकी आशा अकाक्षाओ को बड़ी ही बैरहमी कुचलने स्वयं को धन्य समझते है। मगर क्या करे जब सत्ता में बैठालने बालो को भी इन्तजार करना पढ़ रहा हो तो फिर सत्ता से बैदखल करने की  आम नागरिक की क्या औखात बहरहाॅल जो भी हो मगर सत्ता से यह उम्मीद नही कि जाती खासकर जब ब्यवस्था लोकतांत्रिक हो और मंच से ढोक लगा जनता जनार्दन को प्रणाम करता हो और जनता को भगवान मानता हो ऐसे मे माईबापो का तल्ख मिजाज अशोभनीय ही कहा जायेगा म.प्र. का यह मामला किसी मंत्री संत्री का नही बल्कि मुखिया से जुड़ा है हालाकि स्वयं पर लज्जित वह श्रेष्ठजन इसे अपमान न मान इसे सत्ता का अहंकार मान इसे सृजन कर्तव्य निर्वहन के मार्ग कि बाधा भर करार देते है और कल्याणकारी ब्यवस्था पर कलंक मानते है उनका स्पष्ट मत है कि जब तक आम नागरिक का मोह गैंग गिरोह बन्द सियासत तथा सर्बकल्याण के स्वकल्याण मे डूबे लोग, दलो से भंग नही होता तब तक अहम अहकार का राज सत्ताओ मे बना रहेगा और आम आशा अकाक्षा इसी तरह लज्जित अपमानित होती रहेगी। जय स्वराज

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