अन्नदाताओं का दर्द और दरियादिली का दर्द सत्ता सियासत...........तीरंदाज ?
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
भैया- म्हारे अन्नदाताओं का दर्द छलक सत्ता, सियासत से चलकर सडकों तक जा पहुंचा है। दरियादिली के नदी के नालों उफान पर है। जिसमें दिल्ली के दरवाजे तो मानों बाढ-सी आ गई हो, जो लगता है सब वहां ले जाने पर उतारू है। बाढ की भयाभयता को भाप उस्तादों की फौज अब छोटी-छोटी बाढ चेक स्टाॅप डैम देश भर में आनन-फानन में बांध तो कहीं दिशा पलट सैलाब को तोड़ ढूढने में जुट गई है। तो वहीं सियासत से ढिया छोड चुके दल इन बांध बधाने में सुराग कर दर्द के सैलाब को सुनामी में बदल सत्ता सियासत को भी चारों खाने चित करने में जुट चुके। तो वहीं दूसरी ओर पशु पक्षी जीवों के टेनों में मची खलबली ने टी.व्ही अखबारों में चिल्ला ठंड की पूर्व संध्या पर चिल्ला चोंट कर शांत समुद्र में खलबली मचा भाया आखिर अन्नदाताओं के दर्द के सैलाब और जीव-जगत में मची खलबली का सच क्या है। आखिर सैलाब दर्द का हो या फिर दरिया का। उसके शांत स्वभाव और अपनी गेल जाना ये तो उसका नैसर्गिक स्वभाव है। फिर सत्ता सियासत इतनी बेचैन क्यों ?
भैये- चैन में वेचैन मूर्खो कर सवाल है ये तो म्हारी सियासत में सोशल इंजीनियरिंग का भाग है। बैसे भी जनतंत्र में सत्यनिष्ठा की खातिर ऐसे प्रयोग होना आम बात है। इसमें खास क्या है। फिर जनतंत्र में आमजन ही तो सर्वोपरि माना जाता है। अगर ऐसे में सत्ता सियासत के कुनवे कोई हलचल है तो निश्चित ही प्रयोगों के दौर में कोई प्राकृतिक आपदा के स्पष्ट संकेत है। बैसे भी आध्यात्म से नाता तोड विधान को त्याग विधि को स्वीकार्य, आत्मसात करने वालों को आखिर आज की सियासत में क्या खतरा हो सकता है। समाधान आज नहीं तो कल सैलाब गुजर जाने के बाद स्वतः सामने होगा क्योंकि आशा पर आसमान जो टिका है।
भैया- तो क्या कडाके की चिल्ला सर्दी में सडक पर टिका दर्द का सैलाब यूं ही बगैर परिणाम के गुजर जायेगा।
भैये- कै थारे को मालूम कोणी अन्नदाताओं की खातिर म्हारी सत्ताओं ने विगत 72 वर्षो में कृषि मंत्रालय से लेकर आयोग, मंडी, बांध, नहर, तालाब, गांव-गांव बिजली, शून्य प्रतिशत ब्याज पर रिण समर्थन मूल्य, फसल बीमा, कृषि यंत्र ट्रेक्टर, बीज, बागवानी, खाद पर अंशदान देशभर में कृषि विश्व विद्यालय शोध केन्द्र, भूमि परीक्षण के केन्द्र हर वर्ष 10 हजार साल नगद, मनरेगा, ग्रीन इंडिया, ओलापाला बाढ़, पीडित किसानों को मुआवजा 20 रूपया किलो मोटा अनाज खरीद एक रूपये किलो में मय नमक के वितरण स्कूल आने जाने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री सडक, शिक्षा के लिये स्कूल और पोषण के लिये आगनबाडी तथा स्वास्थ्य केन्द्र हर एक चीज की तो व्यवस्था कर रखी है म्हारी सरकार ने।
भैया- तो फिर दर्द का सैलाब सडक पर क्यों ? कहीं ऐसा तो नहीं कि दवा हकीमों के आभाव में अन्नदाताओं का दर्द नासूर बन सडक पर कुलाचे भर रहा हो।
भैये- फिलहाल यह थारा दर्द है। मने तो बोल्यू अधिक अन्न और जल भी तो शरीर को निर्मल और रूपग्रस्त बना देता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि पोषण के नाम कुपोषण ने अपनी जडे जमा दर्द का सैलाब बना डाला हो। यह तो भाया सत्ता सियासत के समझ की बात है। म्हारी समस्या नहीं।
भैया- मने समझ लिया थारा इशारा कि उस्ताद, हकीमों का ही सारा खेल म्हारे को समझ आता है जो सैलाब सडक पर है मगर मने तो इतना चाहूं कि कडकती सर्दी और चिल्ला ठंड के बीच कहीं म्हारे अन्नदाताओं के दर्द का सैलाब बर्फ बन कहीं जम न जाये क्योंकि बर्फबारी की सर्दी और चिल्ला ठंड का दौर है और सियासत आजकल बेरहम ही नहीं आदमखोर है। इसलिये मने तो चाहूं कि म्हारे अन्नदाताओं की जो भी समस्या हो जल्द निदान तक पहुंच पाये और सत्ता के मंसूबे बगैर किसी लागलपेट के राष्ट्र व जनहित में पूरे हो जाये यहीं मानव जीवन की आज के हालात में सफलता और सार्थक होगी।
जय स्वराज

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