लोकतंत्र में वैचारिक विरोध होना स्वभाविक है, मगर प्रमाणिक पुरूषार्थ पर शक मानवीय निष्ठा को शुभसंकेत नही
विधि तथा मर्यादा विरूद्ध अहंकारी अवरोध खतरनाक
स्वार्थवत संघर्ष सिर्फ सर्बकल्याण मे कलंग ही सिद्ध हुये है सक्षम सफल नही रहै
व्ही. एस. भुल्ले
म.प्र. विलेज टाइम्स समाचार सेवा
पूरा आधा माह गुजरने के बाद अन्नदाताओ का आन्दोलन भले ही आज परिणाम विहीन हो जिसमे दोनो ही ओर से रस्साकसी स्पष्ट दिखाई पड़ती है जहाॅ आन्दोलन कारी अपनी माॅग पर अड़े है तो वही सरकार भी आन्दोलनकारियो और देश भर के किसानो को यह समझाने मे जुटी है कि उसके द्वारा लाया गया कृषि बिल देश के किसानो के हित मे है अब ऐसे मे क्या रास्ता निकलेगा यह तो सरकार और आन्दोलन कारी ही जाने मगर जिस कड़ाके की सर्दी मे किसान सड़को पर जमे है उससे स्पष्ट है कि दर्द जो भी हो, जिसका भी हो कुछ तो ऐसा है कि बात नही बन रही मगर सरकार कि ओर से जो दलील आ रही है वह काफी चैकाने बाली है कि कुछ राजनैतिक दल देश के भोले भाले किसानो को बर गला अपने सियासी स्वार्थ साधना चाहते है जो न तो देश हित मे है न ही किसानो के हित मे कहते है लोकतंत्र मे वैचारिक विरोध स्वभाविक प्रक्रिया है मगर प्रमाणिक पुरूषार्थ पर सबाल खड़े करना उसे अपमानित करना करना लोकतांत्रिक संस्कृति नही हो सकती क्योकि कानून बनाने बाली सरकार जनता द्वारा चुनी हुई विधि सम्बत है और लोकतांत्रिक ब्यबस्था मे बहुमत के आधार पर उसे देश, जनहित मे कानून बनाने का अधिकार है जिसे 5 बर्ष का समय मिलता है और सहमति असहमति व्यक्त करने सदन है और सामूहिक विरोध का भी अधिकार मगर जीवन निर्वहन मे अवरोध उचित नही समाधान संबाद से ही निकलेगा अहंकार से नही क्योकि हमे यह नही भूलना चाहिए स्वार्थवत संघर्ष कभी सफल नही रहै बल्कि कलंक ही साबित हुये है इसलिये सरकार सियासत दलो को ठंड मे बैठै किसानो के दर्द को समझते हुये अबिलंब समाधान अवश्य निकालना चाहिए यही देश और जनहित मे होगा । जय स्वराज

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