अहंकार में डूबी महात्वकांक्षा, आशा अकांक्षाओं के बीच टकराब, मानव, जन, राष्ट्र्हित में और न ही जीवजगत के हित मे


सार्थक संवाद संबैधानिक समाधान की हो शुरूआत 

अन्नदाता का दर्द और सत्ता की सार्थकता को समझना होगा एक दूसरे का दर्द


व्ही. एस. भुल्ले

विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

दिल्ली की सीमाओ पर डटे किसानो के बीच मामला कहा उलझा है ये तो सरकार और किसान बता सकते है मगर अभी तक बाहर आये मसौदे से एक बात साफ है कि बात इतनी बढ़ी नही जिसका समाधान न हो सके लेकिन जहाॅ एक ओर सरकार अपनी प्रतिष्ठा को सामने रख समाधान चाहती है तो वही दूसरी ओर किसान भी माॅग से दो कदम पीछे नही हटना चाहते अगर दोनो पक्ष ही बीच के मार्ग को आत्मसात करते हे तो समाधान दूर की कोणी नही रहेगा जो राष्ट्र्, जनहित तथा जीवजगत के हित मे होगा और ही होना चाहिए क्योकि मौजूद सरकार भी देश के अन्नदाताओ द्वारा चुनी हुई है और आन्दोलित अन्नदाता भी इसी देश के है ऐसे समाधान ढूढ़ने कोई बाहर से आने बाला नही यह बात सत्ता और अन्नदाताओ को समझनी होगी तकलीफ सत्ता को या अन्नदाताओ शर्मिदगी तो इस महान राष्ट्र् को उठानी पढ़ रही है और कष्ट नुकसान भी राष्ट्र् को ही उठाना पढ़ा रहा है जिससे न तो सत्ता अछूती रह सकती न ही अन्नदाता मोर्चाबन्दी सियासत, अहंकार भी बना रहै मगर लोकतं़त्र के अचूक अस्त्रो का इस्तमाल राष्ट्र्, जन जीवजगत की समृद्धि खुशहाॅली के लिये हो तो आपत्ति किसे हो सकती है मगर परिणाम विहीन हट किसका भला करेगी आज यही बात सभी के लिये समझने बाली होनी चाहिए। जय स्वराज 


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