जी एस टी के दंश से हलाकान बेरोजगार

 अव्यवहारिक अहंकारी निर्णयो का दंश झेलता देश 


अजीब अंदाज मे सेवाकल्याण, चारो खाने चित पढ़ा आत्मनिर्भर आगाज

व्ही. एस. भुल्ले

विलेज टाइम्स समाचार सेवा 


म.प्र.- भले ही शासन की आय मे इजाफा और दीनहीनो विकास कल्याण की खातिर तथा व्यापार व्यवसाय को सुगम बनाने के लिये सत्ताओ ने देश मे जी एस टी को लागू किया मगर हालिया समझ यह है कि अगर कोई व्यवसाय करना चाहै तो उसे सर्ब प्रथम जी एस टी नम्बर लेना होता है सम्भवता उसकी प्रक्रिया भी उसे आॅन लाइन पूरी करनी होती है जिसमे संवाद का माध्यम अंग्रेजी मे ही आॅनलाइन ही रहता है मगर सबसे अहम सबाल यह है कि रजिष्ट्र्ेशन नम्बर मिल जाने के बाद उस बेरोजगार को हर महीने आॅनलाइन ही रिर्टन फाइल करना होता है अगर वह किसी भी कारणा रिटर्न फाइल न कर सके तो उसे कुछ दिनो या महिनो बाद हजारो रूपये का जुर्माना भरना पढ़ेगा भले वह व्यपार के लिये पूॅजी जुटा पाये या उसे व्यपार करने का मौका मिल पाये यह तो अजीव ही सेवा कल्याण हुआ न । जबकि कौन नही जानता की पूरी कीमत चुकाने के बाबजूद न तो समुचित बिजली ही मिल पाती है न ही बगैर काॅल ड्र्ाप धीमा नैट के चलते कीमत अनुसार संचार सेवा नसीब हो पाती है फिर हिन्दी भाषी लोगो के देश मे फुल्ली अॅग्रेजी मे रिटर्न और कम्पुटर से अनभिज्ञ को लोगो का रिटर्न आखिर निरीह लोगो से क्या मजाक है समझने बाली बात होना चाहिए ये तो वही बात हुई कि सूत न कपास जुलाहो मे लठठम लठठा मे समझने मे अनभिज्ञ प्रतीत हो रहा हॅु कि आखिर हमारे हुक्मरानो को हुआ क्या है जो वह ऐसा व्यवहार अपने ही लोगो के साथ कर रहै है जिनके सेवा कल्याण की जबाबदेही इन्ही हुक्मरानो पर है बैहतर हो इस पर विचार हो नही तो रोजगार से पूर्व इस पठानी बसूली का धन कहा से आयेगा बैरोजगार तो व्यापार से पूर्व ही पैलेन्टी भरते भरते आत्म तो दूर निर्भर भी नही बच पायेगा सत्ताओ के लिये आज यह समझने बाली बात अवश्य होना चाहिए। 


Comments

Popular posts from this blog

खण्ड खण्ड असतित्व का अखण्ड आधार

संविधान से विमुख सत्तायें, स्वराज में बड़ी बाधा सत्ताओं का सर्वोच्च समर्पण व आस्था अहम: व्ही.एस.भुल्ले

श्राफ भोगता समृद्ध भूभाग गौ-पालन सिर्फ आध्यात्म नहीं बल्कि मानव जीवन से जुडा सिद्धान्तः व्यवहारिक विज्ञान है अमृतदायिनी के निस्वार्थ, निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन, त्याग तपस्या का तिरस्कार, अपमान पडा भारी जघन्य अन्याय, अत्याचार का दंश भोगती भ्रमित मानव सभ्यता