जिसका का डर था आखिर वही हो रहा है, दिल्ली में किसान आन्दोलन बैक फुट पर सत्ता सरकार अहंकार मे मिट गये न जाने कितने वंश, अहंकार ही वह शत्रु था जो ले डूबा रावण और कंश सत्य को लेकर दिल्ली की सीमाओं पर बखेड़ा
म.प्र. विलेज टाइम्स समाचार सेवा
म.प्र.- नये कृषि कानून को लेकर दिल्ली की सीमाओ पर मचे बखेड़ा का सत्य जो भी हो आखिर हो वही रहा है जिसका डर पहले से था शायद सत्ता की खातिर आमजन के आगे ढोक लगा सत्ता हथियाने बालो यह इल्म नही रहता कि वोट की खातिर वह जो आचरण प्रस्तुत कर जिस संस्कृति को जन्म दे रहै है आज नही तो कल उसका हिसाब किताब सत्ता और सियासत दोनो को ही देना है मगर 72 बर्षो मे मुगालतो की माहिर सियासत यह भूल जाती है कि हर चीज का अन्त सुनिश्चित है । यह कटु सच है देखा जाये तो जिस अहंकार के रथ पर सबार सत्ताये सर्बकल्याण का परचम फहरा सम्राट बनने आतुर रहती है और समय बैसमय अश्व मेघ यज्ञ का आयोजन कर राष्ट्र् जन कल्याण की समृद्धि खुशहाॅली की खातिर आहूतियाॅ देती नही थकती वह शायद भूल जाती है कि यह लोकतंत्र है जनतंत्र है इसमे सत्ता तभी तक सुरक्षित रहती है जब तक जन लोक कल्याण सुरक्षित, समृद्ध बना रहता है मगर जब जनहित राष्ट्र् हित पर आच आती है तो फिर वही होता है जो दिल्ली की सीमाओ पर हो रहा है बैसै भी यह कटु सच है कि जब जब उर्जा को बाधित कर सर्बकल्याण की कोशिस हुई परिणाम सार्थक सफल नही रहै फिर वह मानवीय उर्जा हो या फिर नैसर्गिक उर्जा परिणाम सामने है जिस ब्यबस्था मे 500 आन्दोलित कर्मियो को पुलिस को लाठी चलाना पढ़े ऐसी सत्ताओ कि संवेदन शीलता का अन्दाजा लगाया जा सकता है हो सकता है सत्ता का स्वभाव ही अहंकारी हो सो वह सेवा कल्याण के लिये काबिज होने के साथ ही अहंकारी हो जाती है बैसै भी कहाबत है कि अहंकार मे न जाने कितने मिट गये वंश अहंकार ही था जो ले डूबा रावण और कंश जय स्वराज।

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