आधार हीनता का आध्यात्म................तीरंदाज ? वैचारिक शून्यता ने किया सियासत का सत्यानाश
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
भैया- मने तो मानू राष्ट्र, जन जीव कल्याण से बडा न तो समूचे भूभाग पर न तो कोई कर्म है और न ही मानव धर्म, मगर उस आधारहीन आध्यात्म का के करूं जो वैचाारिक शून्यता के चलते स्व-स्वार्थ की छत्र-छाया में स्वयं को समृद्ध बना संघर्ष के रास्ते सर्वकल्याण के नाम सियासत का ही सत्यानाश करने पर उतारू है। आज का सियासी विरोध वैचारिक या फिर व्यवहारिक न होकर जीवन मूल्यों से इतर मनमानी पर उतारू दिखाई देता है। कै वाक्य में ही म्हारे मठाधीशों का आधार निराधार हो चुका है जो जन, राष्ट्र कल्याण के नाम विभिन्न वेषभूषा में वेजुबानों की ओट में जान पडता है।
भैये- मुयें चुपकर म्हारे अन्नदाताओं को कड़ाके की सर्दी के बीच पूरे दस दिन सडक पर संघर्ष करते हो लिये है और थारे को मशखरी छूट रही है। इसलिये मने तो बोल्यू थारा आधार इसलिये अभी तक काला-पीला चिन्दी पन्ने में ही सिमटा है और भाई लोग मल्टीकलर से आगे दिघदर्शन की दुनिया में धूम मचा रहे है।
भैया- तने तो गुस्सा थूक मने सिर्फ ये बता कै थारी सरकार म्हारी खेती किसानी पर बने कानून का कुछ कर पायेगी या फिर म्हारे अन्नदाताआंे की मशक्कत सियासी छत्र-छाया में यूं ही बेकार जायेगी।
भैये- शौचालय से लेकर आवास और पानी से लेकर स्वास्थ्य, सबसिटी जीरो पर्सेन्ट ब्याज पर रिण खाद पानी, बिजली, प्रशिक्षण प्रदर्शन सब तो फोकट में मिल रहा है। इतना ही नहीं 20 रूपये किलो में खरीदा गया अनाज दो रूपये किलो मिल रहा है। बाढ़, पाला सूखा अब तो 6 हजार नगद सम्माननिधि के रूप में मिल रहा है। मगर गजब है चैसर पर पांसा फैकने वालों का कि इसके बावजूद भी म्हारे अन्नदाताओं का विरोध के नाम सियासत को समर्थन मिल रहा है।
भैया- तने म्हारे को ये सेवा कल्याण की सियासत मत सुना, सच क्या है खोलकर बता, कै थारे को मालूम कोणी अवैध उगाही का बाजार खूब फल-फूल रहा है और म्हारा अन्नदाता खेत से लेकर मंडी और बाजारों तक सरेयाम लुट रहा है। अगर आयोग समिति सत्ता सरकारों ने सस्ती लोकप्रियता के सहारे सत्ता हथियाने के बजाये अन्नदाता के उत्पादन का मूल्य बांधने और उस मूल्य को सुरक्षित कर अन्नदाता का संवर्धन किया होता तो अन्न्दाता कृषि प्रदान होने के नाते आत्मनिर्भर हो लेता नहीं दाता होता है। मगर मुई सियासत का कै करें जिसकी गंगा जमुना सस्ती लोकप्रियता और वोट कबाडु सियासत से ही निकलती है। यह सर्वविधित है जब-जब स्वभाव विरूद्ध कृत्य जीवन में होता है तो उसकी विध्यवंशक क्रिया का लाभ ऐसे लोगों को अवश्य मिलता है। जिनकी आस्था न तो स्व कल्याण में होती है न ही सर्वकल्याण में।
भैये- तने थारा ज्ञान-विज्ञान बचाकर रख थारे को आडे वक्त काम आवेगा। जैसे और प्रदर्शन विरोध हुये यह भी हो जावेगा। मगर जीवन मूल्यों की रक्षा सिर्फ और सिर्फ वैचारिक आधार ही कर पावेगा।
भैया- मने समझ लिया थारा इशारा कि अब आधार आस्थाविहीन लोगों की दाल सियासत में नहीं गलने वाली। इसलिये मने तो म्हारे गौवंश के हक पर ही दिमाग लगाऊंगा और हाथों-हाथ किसी को मिले न मिले म्हारे गौवंश को न्याय अवश्य दिलाऊंगा। चल गया तो जादू, चूक गये तो मौत, कम्पनी का प्रचार है। बोल भैया कैसी रही। जय सियाराम

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