धरातल पर दम तोड़ती, आशा आकांक्षाये न विधान के रहे न संबिधान के बन सके बैखोफ तंत्र मे मयूस लोकतंत्र

व्ही.एस.भुल्ले

म.प्र. विलेज टाइम्स समाचार सेवा 


म.प्र.-व्यवहारिक सच से इतर सैधांतिक सच को स्वीकारना आज के जीवन की बैबसी हो सकती है मगर बाध्यता कतई नही जिस सम्द्ध खुशहाॅल जीवन की खातिर कभी आम जीवन ने अपने हजारो बर्ष पुराने विधान को त्याग संबिधान को अगीकार कर अपनी सम्पूर्ण आस्था इस महान लोकतंत्र मे व्यक्त कर अपना विश्वास लोक के कल्याण की खातिर तंत्र पर किया आज आजादी के 72 बर्ष बाद वह मायूस निराश है कारण हमारे तंत्र से जो उम्मीद समृद्ध खुशहाॅल जीवन ने लगा रखी थी वह धरातल पर उम्मीद के मुताबिक मूर्तरूप नही ले सकी और हम अपनो के ही बीच हताश निराश हो लिये आज जिस बैखोफ अंदाज मे सेवाकल्याण सरपट दौड़ रहा है जीवन की रेत पर लकीर तो दिखती है मगर उसके कल्याणकारी पदचाप नजर नही आते आज लोकतंत्र के लिये यही सबसे बड़ा चिन्ता का बिषय हे जिसपर सत्ताओ को अबिलम्ब विचार अवश्य करना चाहिए क्योकि कोई भी सत्ता पहली और आखिरी नही होती सत्ताये आती जाती रहती है मगर विश्वास जीवन मे पहली और आखिरी आस्था होती है जिसे बचाना हर सत्ता सियासत और श्रेष्ठजनो का कर्म और धर्म होना चाहिए।

जय स्वराज

Comments

Popular posts from this blog

खण्ड खण्ड असतित्व का अखण्ड आधार

संविधान से विमुख सत्तायें, स्वराज में बड़ी बाधा सत्ताओं का सर्वोच्च समर्पण व आस्था अहम: व्ही.एस.भुल्ले

श्राफ भोगता समृद्ध भूभाग गौ-पालन सिर्फ आध्यात्म नहीं बल्कि मानव जीवन से जुडा सिद्धान्तः व्यवहारिक विज्ञान है अमृतदायिनी के निस्वार्थ, निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन, त्याग तपस्या का तिरस्कार, अपमान पडा भारी जघन्य अन्याय, अत्याचार का दंश भोगती भ्रमित मानव सभ्यता