सृजन मे सार्थक भययुक्त नही भयमुक्तउर्जा से संघर्ष करता अहंकार सर्बकल्याण मे अक्षम असफल सिद्ध होता सेवा कल्याण सत्ता सियासत की दरकार
म.प्र. विलेज टाइम्स समाचार सेवा
म.प्र.- अज्ञानता बस आज जिस तरह से मानव सृजन मे मानव के जीवन मूल्यो को दरकिनार कर जिस निष्ठा पूर्ण कर्तव्य निर्वहन मे जुटा और सियासत सत्ताये उर्जा से सीधे संघर्ष को उतावली नजर आती उससे सर्बकल्याण मे सेवा कल्याण की सिद्धता सिद्ध होना असंभव ही नही नमुमकिन सा जान पड़ता है क्योकि सृजन मे सार्थक भययुक्त नही भयमुक्त सत्ता सियासत कि सिद्धता रही है जिसका भाव अनादिकाल से अहिसंक मगर सर्बकल्याण का हामी रहा है जो सृजन मे सिद्ध भी है और सफल भी और अकाटय सत्य भी है । क्योकि सम्पूर्ण सृष्टि सृजन का आधार उर्जा है जिसके मुख्य श्रोत जल,वायु,सूर्य कहै जा सकते है इसके अलाबा भी सृष्टि मे सृजन चक्र न रूके इसलिये मूल जीवन के आधार से प्राप्त जीवन मे भी उर्जा के अशं का सृष्टि संचार रखा है फिर वह पैड़ पौधे जीव जन्तु ,पक्षी, मानव या समस्त भूभाग पर मौजूद कोई भी जीवन हो सभी मे सृजन कि खातिर उर्जा का अंश मौजूद है जिसे रोकना सीधे सृष्टि से ही संघर्ष कहा जायेगा जिस तरह कोई भी ताकत सूर्य के उगने डूबने ,और वायु के वेग कि दिशा , जल के प्रवाह कि दिशा नही बदल पाया ठीक उसी प्रकार जीव के अन्दर मौजूद उर्जा को रोक पाया क्योकि उर्जा का आधार प्रवाह है और सृजन मे मानव ही एक ऐसा जीव जो अपनी नैसर्गिक श्रेष्ठा के चलते उर्जा के प्रवाह को दो दिशा दे सकता है बशर्ते उसका भाव सृजन की श्रेष्ठता मे स्वयं का निष्ठापूर्ण योगदान और कर्तव्य निर्वहन हो मगर जब मानव श्रेष्ठाता के नाम सत्ताओ सियासतो का सेवा कल्याण के रास्ते सर्बकल्याण मे जो अहंकारी आचरण सिद्ध होता है वह न तो सृष्टि, सृजन ,न ही मौजूद जीवन के हित मे है बैहतर हो कि मानव अपनी नैसर्गिक श्रेष्ठता सिद्ध करने उर्जा के स्वभाव को समझ उसे रोकने उससे संघर्ष करने के अहंकार पूर्ण स्वभाव को त्याग सृष्टि सृजन मे अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करे यही मानव जीवन की आज के समय सबसे बड़ी उपलब्धि मानव की होगी। जय स्वराज

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