मोदी बर्तमान है तो भबिष्य गढ़ने मे कोहराम क्यो ?


जो कौम सामर्थ अनुसार कृतज्ञतापूर्ण स्वयं का पुरूषार्थ सिद्ध करने में कोताही करती है भबिष्य उन्है कभी माफ नही करता

व्ही. एस. भुल्ले

विलेज टाइम्स समाचार सेवा


म.प्र. - सत्ता सियासत मे विगत कुछ बर्षो से जो कोलाहलपूर्ण माहोल है इसका सच तो राष्ट्र जन ही जाने मगर इतना तो है कि दोनो ही स्तरो पर कुछ ऐसा घट रहा है जिसे लेकर कोई भी निष्ठापूर्ण सच नही बोलना चाहता आज कि मोदी विरोधि सियासत ने न केवल आमजन बल्कि समुचे राष्ट्र को सोचने विचार करने पर मजबूर कर दिया है मगर ऐसे मे राष्ट्र जन की जबाबदेही बनती है कि वह दूध का दूध और पानी का पानी कर अपने सामर्थ पुरूषार्थ से यह सिद्ध करे कि कौन सही बोल रहा है और कौन झूठ बोल रहा है और यह तभी सिद्ध हो सकता है जब हम बर्तमान की कषोटि पर भूत तथा संभावित भबिष्य की कल्पना कर समीक्षा करे । दूसरी बात यह भी हो सकती है कि अगर मोदी बर्तमान है तो भबिष्य तो हमे ही गढ़ना है हमे यह नही भूलना चाहिए कि जो कौमे समय रहते अपने सामर्थ अनुसार पुरूषार्थ करने मे कोताही या अपनी नैषर्गिक कृतज्ञता सिद्ध करने मे असफल अक्षम सिद्ध होती है उन्है न तो भबिष्य न ही आने बाली पीढ़िया माफ करती है कहते है अगर संरक्षक सिद्ध , त्यागी , सेवाभावी हो तो फिर सामर्थ अनुसार पूरूषार्थ मे कोताही क्यो ? आखिर कभी दो सासंदो बाली पार्टी और एक साधारण से असाधारण बने नागरिक ने भी तो देश की सत्ता तथा प्रधानमंत्री तक का सफर सामर्थ अनुसार अपने पुरूषार्थ से ही हासिल किया है जो अपने आप मे एक इतिहास, और बर्तमान है जो अपने सामर्थ अनुसार राष्ट्र जन की खातिर स्वयं की कृतज्ञता सिद्ध करने अपने संस्कार नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप पुरूषार्थ पूर्ण निष्ठा से कर रहै है निशंदेह इसमे किसी को संदेह नही होना चाहिए कि जब भी किसी बढ़े बदलाब की ब्यार चलती तो जीवन को असहनीय तकलीफ तो होती ही है और नैसर्गिक ही नही प्राकृतिक रूप मे भी सत्य है हमे यह नही भूलना चाहिए कि समुद्र मंथन फिर जल वायु और फिर नया सृजन फिर क्षैत्र जो भी हो फाॅरमूला गणित की तरह एक ही है अगर इस सत्य को हम समझ पाये कि बगैर पीढ़ा नया सृजन असंभव ही नही नमुमकिन है तो जीवन मे न तो कोई समस्या होगी न ही कोई कोहराम आज के समय मे स्वराज या आत्म निर्भरता मे आस्था रखने बालो के लिये समझने बाली होना चाहिए। जय स्वराज

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