न हम भारतबर्ष रहै न ही यूरोप बन सके , अपनी ही संपदा पर हाथ आजमाते भाई लोग
मानवीय मूल्यो पर प्रहार करती तथाकथित मूढ़धन्य विद्धबानो की टोली गाॅब गली मे बढ़ती पैठ घातक
व्ही. एस. भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा
सामथ्र्य स्वार्थ बस जिस तरह से प्रतिभाओ के हुनर विधा का दमन संसाधन संरक्षण के अभाव मे हो रहा है ऐसे चरित्र आचरण के बीच इतना तो साफ है कि न तो हम अब भारत बर्ष ही रहै न ही यूरोप के सार्गिद बनने के चक्कर मे यूरोप ही बन सके इतिहास गबाह है कि प्रतिभा विधा संरक्षण संर्बधन के लिये जो पहचान कभी भारतबर्ष के शासको ने स्थापित की और जिसके लिये भारत को भारतबर्ष के रूप मे जाना जाता था वह सामथ्र्य और स्वार्थ के आगे दम तोड़ते नजर आते है वही दूसरी ओर सियासी मठो से निकल तथाकथित विद्यवानो की टोलियो ने गाॅब गली के भोले भाले बैहाल लोगो के बीच अपनी पैठ जमा अपने अपने मंसूबे पूरे करने मानवीय मूल्यो की कीमत पर घातक खेल शुरू किया है वह बड़ा ही खतरनाक है ऐसा नही कि इस खेल सत्ता सियासत अनभिज्ञ हो मगर सत्ता के आगे राष्ट्र मानव कल्याण की किसको पढ़ी है जब से राष्ट्र कल्याण का कार्य क्या शुरू हुआ है तभी से देश मे किसी न किसी बहाने कोहराम मचा रहता है कारण सृष्टि सृजन सिद्धांत के विरूध कल्याण का भाव जो समृद्ध खुशहाॅल राष्ट्र निर्माण के मार्ग की सबसे बढ़ी बाधा है बहरहाॅल फिलहाॅल तो सबसे बड़ा सबाल प्रतिभा संरक्षण को लेकर है देखा जाय तो आज भी यूरोप मे विद्या कि सिर्फ कीमत ही नही उन्है संरक्षित भी किया जाता है मगर कभी जो स्वयं प्रतिभा निर्माण का नैषर्गिक हव हुआ करता था वहा प्रतिभाओ छला जाता है अगर यह सच है तो यह बहुत घातक है ऐसे मे तथाकथित विद्यवानो की पौ बारह होना स्वभाविक है बैहतर हो सियासत सत्ता और आमजन इस बिकट समस्या पर विचार करे कही ऐसा न हो कि बड़ी देर हो जाये तब न तो राष्ट्र भक्त ही कुछ कर पायेगे न ही सत्ता को स्वयं की जागीर समझने बाले अपनी जागीर बचा पायेगे क्योकि हवा और जल के प्राक्रतिक वेग को अच्छे अच्छे पहाड़ पैड़ तक नही रोक पाते फिर छोटे मोटे बाॅध तटबन्धो की औकात ही क्या ? थोड़ा कहा बहुत समझे आज के समय मे यही सबसे बड़ी समझने बाली बात राष्ट्र जन सियासत सत्ताओ के लिये होना चाहिए। जय स्वराज

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