दर्द का दंश, अब तो कुछ करो.............?
व्ही. एस. भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा
72 बर्षो के अथक परिश्रम और पूर्वजो के त्याग बलिदान संघर्ष पर हम आज भी कोई सबाल नही करेगे क्योकि हम संस्कारिक है हमारे पूर्वजो द्वारा अंगीकार विधान हमारी बिरासत है और हमारी पूर्ण आस्था हमारे संबिधान मे है मगर हम वंशानुगत परमार्थी ही नही पुरूषार्थी भी है हमारे सामर्थ की कोई प्रमाणिक सीमा नही जो दुनिया नही कर सकती उसे सहर्ष हम करने मे सक्षम है हमारे धैर्य की गहराई अथाय है जिसको कोई नही पा सकता इतिहास गबाह है ।
मगर माननीय श्रीमानो, माईबाप आप हमारे ही बीच से है आप हमारे अपने है आप मे हमारी निष्ठा है और पूर्ण विश्वास भी कि आप कभी हमारी आशा अकांक्षाओ की पूर्ति मे हमे कभी निराश नही करेगे पुरानी कहावत है अपना मारे छाये मे डारे पराया मारे घाम मे डारे सो अपकी निष्ठा कृतज्ञता मानव जीवन मे निष्ठ है आप पुरूसार्थी होने के साथ परिश्रमि भी है आप पर हमे गर्व है और आपकी सहृदयता पर हमारा कोई सबाल भी नही नही मगर दिल्ली ही नही जब तब आन्दोलनो के नाम जब सड़को पर हमारे विश्वाश आशा अकांक्षाओ सरेआम बलात्कार होता है और सिर्फ आप ही नही हम शर्मिदा होना पढ़ता तथा जब लोग हमारी संस्कारिक विरासत पर सबाल उठाते है तब हमे दर्द होता है और तखलीफ भी होती है क्योकि हमारी संस्कृति संस्कार त्याग तपस्या अनगिनत कुबार्नियो का प्रतिफल है जिसे हम यू सबाल बनते नही देख सकते ।
हम और कुछ बर्ष भूखे रह मुफलिसी मे गुजार लेगे कड़े परिश्रम पश्चात खुले आसमान मे सो लेेगे अपनी आने बाली पीढ़ी बच्चो को समझा लेगे कुछ दिन और जन्म और जवानी पर मातम नही मनायेगे उन्है समझायेगे की मेकाले की शिक्षा सिस्टम मे आनजाने मे ही सही आस्था रखने बाले हमारे अपने आज नही तो कल तरस अवश्य खायेगे धैर्य रखे सब ठीक होगा आप विचलित न हो हमारे जनधन से सेवा मे निष्ठ लोग हमारे अपने है मगर समय रहते सूरत और सीरत तो सुधार लो नही तो कही ऐसा न हो कि हम अपनो के ही बीच अविश्वसनीय साबित न हो जाये तब क्या होगा इसलिये आज यही सबसे बड़ी समझने बाली बात होना चाहिए जब तक हम मेकाले से छुटकारा पा स्वयं को स्थापित नही कर लेते तब सबाल बने रहना हमारी नियती ही कही जायेगी जो हमारे संस्कारो के विरूद्ध है काश इस सच को हम तहै दिल से अंगीकार कर इस गलती को सुधार पाये तो यह हमारे मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी और हमारे माननीय श्रीमानो का सम्मान । जय स्वराज

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