स्थापित सृजन सिद्धांतो की अनदेखी अनसुनी उसके स्वभाव विरूद्ध सरोकारो से सत्ता सियासत का व्यवहार तो सत्यानाश ता स्वभाविक है
दिल्ली की सड़को पर मचा कोहराम शर्मनाक, मगर अस्वभाकि नही, अंगीकार किया है तो, विधि विधान मानना जबाबदेहो का मूल कर्म ही नही धर्म और मानव धर्म भी है
व्ही. एस. भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
विरोध के अधिकार को भुनाने अड़े अन्नदाताओ मौका क्या मिला गणतंत्र दिवस के ही दिन दिल्ली की सड़को कोहराम मच गया कोहराम मचाने वाले भी हमारे अपने ही थे जिन्होने न सिर्फ स्वयं की अहिंसक महान संस्कृति और पुरूषार्थ के इतिहास से पटे पड़े उस भूभाग को कलंकित करने का कार्य किया है जिसकी कीर्ति पर हजारों बर्ष बाद भी हम स्वयं पर गर्ब कर गौरान्वित मेहसूस करते है और पूर्वजो के भव्य दिव्य जीवन को धर्म मान उन्है शुभ मोको पर याद करते है मगर जो नही होना चाहिए था वह तो हो गया यह वही दिल्ली है जिसने वहा दौर भी देखा जब विदेशी अक्रान्ताओ ने दिल्ली पर फतह हासिल की तो तालिया बजा रहै थे यह वही दिल्ली है जहाॅ हमारी ही बच्चियो पर लोमहर्षक जुर्म भी हुये है यह वही दिल्ली है जिसकी भूमि न जाने कितनी मर्तबा हमारे ही लहु से लाल हुई है । मगर कहते जब जब दर्द के सैलाब पर सियासत ने रोटी सेकने की कोसिश की है तब तब इस महान भूभाग और पुरूषार्थी बलीदानियो कि इस कौम को कंलकित होना पढ़ा है काश जिसे धर्म मानते और मर मिटने तैयार रहते उस धर्म या मानव धर्म का ही पालन किया होता तो आज हमे यह दिन न देखना पढ़ता अगर नही जानते तो प्रकृति सृष्टि सिद्धान्त से ही सीख ले लेते नही तो उस विधि विधान का ही मान सम्मान रख लेते जिसको हमने अंगीकार किया है और जिस विधि को अधिकार मान हम विरोध के नाम बबाल काटने दिल्ली की पर उतर पढ़े और महान इतिहास को कंलकित कर डाला है राम ।

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