जीवन संरक्षण संबर्धन सुरक्षा का आकांक्षी होता है न कि बाधा बिवाद और अर्थहीन संघर्ष का


सत्ता, सियासत , सामर्थ के एहसास पर उठते सबाल घातक

प्रकृति बिरूद्ध सामर्थय का आचरण न कभी सफल रहा है न ही न ही रहेगा इतिहास गबाह है 

व्ही. एस. भुल्ले 


विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

बर्तमान सियासी सत्तागत संस्थागत हालातो को देख सुन इस महान राष्ट्र के पुरूषार्थ सामर्थ को देख दुख भी होता है और दर्द भी होता है यकीनन यह हमारे महान राष्ट्र का न तो सामर्थ हो सकता न ही पुरूषार्थ क्योकि हमारी महान विरासत तो मानव जीव जगत पर्यावरण सहित समुची सृष्टि मे मौजूद जीवन के सर्बकल्याण की रही है जिसके लिये हमारे पूर्वजो ने एक से बढ़कर एक अनगिनत कुर्बानियाॅ दी है और मानव ही नही समुचे जीव जगत के कल्याण कि एक से बढ़कर एक मिशाले प्रस्तुत की है फिर कीमत जान से लेकर जो भी रही हो हमारे पूर्वजो ने रत्ती मात्र संकोच नही किया मगर आज जब हमारे द्वारा स्थापित सत्ता सियासत संस्थाओ का आचरण व्यवहार उनके कर्तव्य निर्वहन की अनुभूति लोक जन जीव कल्याण के विरूद्ध होती है और विधान की विधि की स्थति बैबस नजर आती तो सबाल होना तो स्वभाविक है श्रेष्ठ समृद्ध जीवन के लिये अवश्यक है कि जीवन का संरक्षण संबर्धन सुरक्षा हो न कि बैबजह के संघर्ष और बाधा । कहते है अर्थहीन संघर्ष और प्रकृति आचरण न तो तब सफल रहै न ही भविष्य मे रहने बाले इतिहास गबाह है आज सियासत सत्ता संस्था और आमजन को यह सबसे बड़ी समझने बाली बात होना चाहिए अगर आज भी हम स्वस्वार्थ मे डूब लोक जीवन सृजन की अवेहलना करते रहै तो भबिष्य संबृद्ध नही रहने बाला है जय स्वराज ।

 

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