बैलगाम सियासत , माखौल बना लोकतंत्र , विरोध के नाम बिलखली आशा अकांक्षा और विधान


व्ही. एस. भुल्ले 

विलेज टाइम्स समाचार सेवा म. प्र. 


बैलाम सियासत मे जिस तरह से विरोध के नाम आशा अकांक्षा और विधान सिसकने पर मजबूर है और बिगत एक माह से जिस तरह से लोकतंत्र का माखौल उड़ रहा है वह किसी से छिपा नही मगर सब कुछ खुलेआम चल रहा है जिस तरह से विगत कुछ दिनो से दिल्ली के मार्ग अबरूध है तथा कई दौर की बात आन्दोलन कारियो के बीच असफल हो जाने के बाबजूद जिस तरह से उम्मीद की आश लगाये सत्ता सियासत समाधान का मुॅख देखने आतुर है वह सपना भले ही उनकी उम्मीदो से कोसो दूर हो मगर समाधान की उम्मीद तो लोकतंत्र मे की ही जा सकती है मगर सियासी संग्राम का रूप लेते इस धमासान का इतना सहज समाधान निकलने बाला है यह खामो ख्याली ही कहा जा सकता है न तो जबाबदेह लोग विधान की सुनने तैयार है न ही विधि को मानने तैयार हल कैसे निकलेगा आज यही सबसे बड़ी समझने बाली बात है ऐसे मे सत्ता सियासत तथा विधि का राज धर्म है कि वह सार्थक समाधान खोज लोकतांत्रिक धर्म का पालर करे क्योकि विधि से बढ़कर कोई नही जिसे अंगीकार कर लोगा नंे लोकतंत्र मे आस्था व्यक्त की है ऐसे मे मानव जीवन मूल्यो की रक्षा मे जो भी हो सकता है वह लोकतंत्र का प्रतीक मौजूद सत्ता को करना चाहिए फिर परिणाम जो भी हो यही आज की स्थति मे सत्ता सबसे धर्म और कर्म होना चाहिए । 


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