जुदा तालमेल का दंश भोगता मानव जीवन सर्बकल्याण में स्वार्थ की आहूती सबसे अहम
व्ही. एस. भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा
बताशो की मिठास से आखिर कौन परिचित नही मगर मानव जीवन की समस्या निदान को सजे बातो के बतासो के बाजार जीवन मे जो कड़बाहट पैदा कि उससे जीवन की मिठास का घोर संकट खड़ा हो गया है। शायद शैया पर लेटे पितामह भीष्म ने अपने अन्तिम समय पाण्डवो को शासन सेवा जन कल्याण मे राजा के कर्तव्य बोध का ज्ञान देते वक्त सही कहा था कि देश राजा के लिये नही होता , राजा देश के लिये होता है, और वह राजा कभी देश के लिये शुभ नही होता जो अपने देश के सामाजिक आर्थिक रोगो के लिये अपने अतीत को उत्तरदायी ठहरा सन्तुष्ट हो जाये अगर अतीत ने तुम्है एक निर्वल आर्थिक सामाजिक ढाॅचा दिया है तो उसे सुधारो बदलो क्योकि अतीत तो बर्तमान कि कसौटी पर कभी खरा नही उतरा क्योकि अगर अतीत स्वस्थ होता और उसमे देश को प्रगति के मार्ग पर ले जाने कि शक्ति होती तो फिर परिवर्तन ही क्यो हो ।
आज जब हम राजतंत्र को त्याग लोकतंत्र के भाग है तब स्वयं राजा घोषित होने के बाबजूद और किसी से प्रगति कल्याण समृद्धि की उम्मीद क्यो क्या हमे यह नही स्वीकार लेना चाहिए की हम कर्तव्य बिमुख हो मानव जीवन का मूल कर्तव्य खो चुके है और निजि स्वार्थ के आगे सर्बकल्याण के धर्म को भूल चुके है तथा स्वयं की सत्ता सियासत मे अंगीकार उस शफत को भी भूल चुके है जो हमने विधि अनुरूप अपने विधान को त्याग ले रखी है जीवन मे समृद्धि खुशहाॅली तभी सम्भव है जब हम सर्बकल्याण मे स्वार्थो कि आहूति दे नही तो जिस देश का राजा कर्तव्य बिमुख हो और सिस्टम बैलगाम तो फिर कैसै हो कल्याण काश लोकतंत्र मे आस्था रखने उसे अंगीकार करने बाले महान बिरासत के उत्तराधिकारी हम समझ पाये
जय स्वराज ।

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