प्रकृति विरूद्ध सामर्थ का पुरूषार्थ कल्याणकारी होना असंभव


कल्याण अर्थात धर्म की रक्षा मानव का नैसर्गिक कर्तव्य


सृष्टि सृजन मे कर्तव्य कल्याण भाव अहम 

व्ही. एस. भुल्ले 

विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

कहते है कि कभी रावण के राज मे राक्षस वीरो को हुकम था कि किसी भी स्थति मे ऋषि मुनियो के यज्ञ पृथ्वी पर नही होने देना चाहिए क्योकि ऋषिमुनि अपने ज्ञान विज्ञान से सिद्ध अस्त्र आर्यो को दे उन्है शक्ति शाली बना देगे और राक्षस कुल का सर्बनाश हो जायेगा यह हुकम उस जमाने मे कोइ्र्र छोटे मोटे राजा रजबाड़े नेता नेती माफिया गैंग गिरोहबन्द दल संगठन का नही बल्कि एक ऐसे शूरवीर राजा का था जिसके आंतक का ढंका तीनो लोको मे गूजता था जो स्वयं घोर तवस्वी सिद्ध पुरूष होने के साथ बहुत बलशाली भी था जिसकी सैना मे एक से बढ़कर एक वीर योद्धा मायावियो की लम्बीचैड़ी फौज थी जिसने लम्बे समय तक राज किया तथा जिसके स्वयं के परिवार मे बड़े शूरवीर सहित एक लाख पूत सबाॅ लख नाती होने कि कहावत प्रचलित थी मगर प्रभु राम ने जंगली जीव जन्तुओ के कल्याण मे गहरी आस्था तथा जीव जगत के प्रति उनके कर्तव्यो का निष्ठा पूर्ण पालन कर उनकी मदद से रावण सहित समुची राक्षस प्रजाति का संहार कर कल्याण अर्थात धर्म की स्थापना कि मगर आज के जीवन मे जिस तरह से स्वकल्याण को धर्म मान उस सच्चे धर्म को अध्यात्म मान सुनने पढ़ने तक सीमित कर मानव ने ज्ञान विज्ञान को परिभाषित करने की कोसिश की है उसी परिणाम है कि मानव जीवन कंटक पूर्ण हो रावण के उस स्टेडिंग आदेश को चरितार्थ करता नजर आता है अब इसे मानव जीवन का दुर्भाग्य कहै या सौभाग्य जो न तो सही सुनना चाहता है न ही समझना चाहता है हर एक चक्रवति सम्राट और धन कुबेर रातो रात बनना चाहता हे और अपनो के लिये अकूत दौलत तो मरने बाद अपनो के लिये सिंहासन चाहता है शायद कभी हम उस सच से साक्षात्कार कर पाये जो हमारे एहसास मे तो है मगर समक्ष नही अगर सृष्टि सृजन का संचालन किसी कुबेर या चक्रबति सम्राट के बस की बात होती तो आज इतना बड़ा जीव जगत बगैर किसी के रहमो करम के स्वयं के अस्तित्व मे न होता आज यही सब को समझने बाली बात होनी चाहिए। जय स्वराज  

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