माफिया के खिलाफ मूड मे मुखिया .........? तीरंदाज



भैया- न तो अब प्रदेश मे डाकू , दादाभाई, गुन्डो की मण्डली दिखती है न ही जंगलो मे गैगबन्द गिरोह अर्थात विधि का माखौल उड़ाने बालो का अकाल सा जान पड़ता है फिर भी अन्दर खाने की खबर यह है म्हारे प्रदेश के मुखिया और उनके गाड़ी भरे मातहत माफिया को लेकर हेरान परेशान है और अब तो उन्होने सार्वजनिक ऐलान भी ठोक दिया है कि या तो माफिया प्रदेश छोड़ दे या फिर गैर कानूनी धन्धे छोड़ दे भाया राम राज की परिकल्पना मे आखिर गलत ही क्या बैसै भी म्हारे बटाढार की बिदाई से पूर्व बड़ा नारा था भय, भूख, भृष्टाचार मुक्त ब्यबस्था देने का अब अगर माफिया मुक्त प्रदेश का नारा है तो थारे को दर्द कैसा।

भैयै- म्हारे को कोई दर्द नाये मने तो सिर्फ इतना कहना चाहु कि सबसे पहले तो यह पता किया जाये कि शहर गाॅब को छोड़ माफिया कहाॅ शिफट हो चुके है जो न अब कही उनके पद चिन्ह लोगो को नसीब है न ही खुलेआम ऐसे लोगो के दर्शन उस पर अपराध अपराधियो से भागती हाथ जोड़ कर काम चलाती म्हारे जाॅबाजो की फौज का क्या करे जो संसाधनो या फिर संख्या बल के अभाव मे बैकफुट पर नजर आती है अब कौन समझाये म्हारे मुखिया को कि पहले संसाधन तो जुटा लो फिर बर्र के छते मे हाथ डालो कानून राज निश्चित ही वक्त की माॅग है मगर उसका एहसास भी तो एक सबाल है जिसका सटीक उत्तर खोजना भी मुखिया और मातहतो की प्राथमिकता मे होना चाहिए। 

भैया- तो क्या मने म्हारे शांत प्रदेश से माफियाओ का बोरिया बिस्तर समिटा समझू , मगर मुये काड़ू का कै करू जो लम्बी चैड़ी लिस्ट लिये गाॅब, गली , नगर महानगरो मे घूम रहा है जिसमेे ड्र्ग, वन, खनन, शराब, परिवहन, चिकित्सा, शिक्षा, ठेका, सर्बिस, खाद, राशन, सिस्टम, सियासत, कौन सा क्षैत्र अछूता बचा है जहाॅ माफिया का एहसास अछूता है फिर म्हारे को क्या म्हारे को तो म्हारे पशुधन की चिंता खाये जा रही है 

भैयै- तने तो बाबला शै के थारे को मालूम कोणी म्हारी दिल्ली महान मे अन्नदाताओ का हालिया मार्च हुआ है सत्ता और अन्नदाताओ के बीच मामला अभी भी फसा है ऐसे बताशो के बाजार जोर शोर से चल पढ़े है और लोग जबानी जमा खर्च मे जुट चुके है मने तो बोल्यू जब समुचे कुये मे भाॅग घुली हो तो फिर उम्मीद कैसी ।

भैया- मने जाड़ू मगर कै करू ब्लेक इन व्हाइट धीमी गति का समाचार पत्र होने के साथ अरण्य संपदा के बीच एक नागरिक होने के नाते म्हारी भी तो कोई जबाबदेही बनती है बात जरा सी है संवाद समस्या जिस दिन छन म्हारे को भी कोई महान भाषा परिबर्तक मिल गया म्हारी भी चल जायेगी फिर संवाद की समस्या न तो ग्राम न ही अरण्य मे रहने बालो के बीच बाधा बन पायेगी क्योकि परिवर्तन ही सृष्टि का नियम और विधि भी है सो हम जैसै विधि और विधान से बधे मानवो का धर्म है कि समय का इन्तजार करे और सेवा सर्बकल्याण मे सामर्थ अनुसार पुरूषार्थ करने स्वयं को तैयार करे इतने पर तो चल जायेगी बरना आशा अकांक्षा कि होली यू ही हर पाॅच बर्ष जल उसकी राख स्वच्छता के काम आयेगी । जय स्वराज 


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