कंटको से भरा सेवा कल्याण बना कलंक , सेवा बनी संकट
सबाल साबित होती सत्ताओ की कृतज्ञता
व्ही. एस. भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
जिस सेवा कल्याण को कभी मानव धर्म मान धर्म मानव जीवन मे अंगीकार हुआ और जिस धर्म की रक्षा के लिये महाभारत तक हुआ आज वही धर्म एक मर्तवा फिर से कंलकित होता जान पड़ता है जिस तरह का सेवा कल्याण सत्ता सियासतो का लक्ष्य बनता जा रहा है वह अब सेवा न होकर संकट का रूप ले चुका है कहते है पहली सेवा उस मात्रभूमि की होती है जो हमे जीवन निर्वहन के लिये हमे अपना पवित्र आचल और उसमे अठखेलिया कर खुशहाॅल जीवन निर्वहन करने स्थान देती है दूसरी सेवा उस परमपिता की होती है जो हमे स्वच्छंद वातावरण हमे देता है तीसरी सेवा उस ब्यबस्था की होती है जो हमे संरक्षण दे हमारे जीवन को सुरक्षित रखने की गारंटी देती है और हमारे विकास कल्याण सेवा को समर्पित रहती है मगर मानव के निष्ठापूर्ण कर्तव्य निर्वहन के बाबजूद जब सत्ता सियासत अपनी कृतज्ञता के प्रति अक्षम असफल होती है तो सबाल होना स्वभाविक है नियम कानूनो का मकड़जाल इतना घना है कि मानव जीवन मानो जकड़ चुका हो मगर परवाह किसे छोटे से छोटे काम के लिये ऐड़ी चोटी का जोर लगाना इस बात का संकेत है कि ब्यबस्था मे सब कुछ ठीक नही चल रहा यह बात सिर्फ सियासत ही नही सत्ताओ को भी समझना चाहिए जिसके लिये वह अस्तित्व मे है अगर आम जीवन के मार्ग इसी तरह कंटको से भरे रहे तो न तो मानव जीवन न ही सत्ता सियासत के मार्ग सुरक्षित रह पायेगे अब विचार इस मानव जीवन और सेवा कल्याण को मुस्तेद उन सत्ता सियासत को करना जिनकी सीधी जबाबदेही सेवा कल्याण की बनती है जय स्वराज ।

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