सर्बकल्याण से इतर स्वकल्याण का सारथी बन साम नाम दण्ड भेद के अचूक अस्त्रो से सुसजित सामर्थ पुरूषार्थ
कल्याण को खुली चुनौती देता स्वार्थ
व्ही. एस. भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
कहते है जब जब कल्याण भाव से कृतज्ञता ने दगा किया है तब तब उसकी बहुमूल्य कीमत भी मानव को बैभाव चुकानी पढ़ी है कारण सर्बकल्याण से इतर स्वकल्याण का भाव फिर जीवन निर्वहन मे अरण्य मे निवासरत जीव हो या फिर ग्रामो मे निवासरत मानव रहै हो जिसने भी जीवन के सबसे बड़े धर्म कल्याण से विश्वासघात कर स्वकल्याण को धर्म और कर्म बनाने की कोसिश की है उसे जीवन मे असफलता या दुर्गति ही प्राप्त हुई है फिर कितनी ही वैभव शाली सत्ताये और कितने ही बड़े वीर क्यो न रहै हो इतिहास के रूप मे परिणाम हमारे सामने है काश इस सच को समृद्ध खुशहाॅल जीवन की इच्छा रखने बाले समझ पाये । कहते है कि अगर जीवन मे सामर्थ पुरूषार्थ स्थापित ब्यबस्था मे स्वयं को अक्षम असफल पाते है तो उन्हे सर्बकल्याण की रक्षा मे उसके संबर्धन मे कर्तव्य निर्वहन मे परिवर्तन मे संकोच नही करना चाहिए और विश्वास की छत्रछाया मे अपना निष्ठा पूर्ण कर्तव्य निर्वहन करना चाहिए।
आज जब हम एक लोकतांत्रिक ब्यबस्था का भाग है और औपचारिक अनौपचारिक रूप जन जन का प्रतिनिधित्व करने सियासत या सत्ता का भाग है तो फिर कोताही क्यो ? विश्वास के अभाव मे आज जो हालात व्यक्ति परिवार समाज राष्ट्र के है उसे शुभ नही कहा जा सकता न ही ऐसे मे कल्याण के भाव को सुरक्षित संब्द्ध माना जा सकता आज हमारे पास अकूत धन संपदा प्रतिभा विधान संस्थाये पुरूषार्थ सभी तो है फिर भी हम अक्षम असफल सिद्ध हो रहै आखिर क्यो ? कारण स्वयं स्वार्थ मे डूबा हमारा आचरण चरित्र और धर्म अर्थात कल्याण से दूर हमारा पुरूषार्थ और धन लालशा कौन नही जानता अनादि काल से कितनो ने कितनी अथाय दौलत महल भवन एश्वर्य हासिल किया मगर आज हमारे बीच अकूत दौलत महल भवन तो बैसै के बैसै है मगर उसे हासिल करने बाले बो लोग हमारे बीच नही कुछ के तो बारिस तक नही फिर सर्बकल्याण से दूर मारा मारी क्यो क्योकि साम नाम दण्ड भेद का अस्तित्व कल्याण के लिये सृजन मे मान्य है अर्थात धर्म की रक्षा हेतु न कि स्व कल्याण के लिये यह बात हर उस पुरूषार्थी को याद रखना चाहिए जिसका जीवन सार्वजनिक हो और जिस पर सामर्थ हो । जय स्वराज

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