समृद्ध राजा, की पहचान दया, भीख नही, बल्कि उसका सामर्थ पुरूषार्थ होता है और सर्बकल्याण उसका लक्ष्य


सच को आयना दिखाता स्वार्थ, समृद्धि को सिसकता जीवन 

व्ही. एस. भुल्ले 


विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

सच को आयना दिखाने की आदत तो मानव मे अनादिकाल से रही है मगर सच को सच कह सके यह ताकत राजा मे रही है अब चूकि न तो राजतंत्र है न ही हमारे यहाॅ राजा लोकतंत्र मे तो राजा स्वयं जनता ही कही जाती है ऐसे मे राजा का क्या कर्तव्य होना चाहिए यही आज सबसे बड़ा सबाल है । अगर सच कहे तो जनता के पास 5 बर्ष मे एक मर्तवा वोट देकर सरकार चुनने के बाद सिवाय विभिन्न माध्ययमो से शासन को टेक्स देने के अलावा भीख दया से बचने का कोई माध्ययम नही जो चुनी हुई सरकारो के रहमो करम पर निर्भर करती है क्योकि हमारा विधान इसी कर्तव्य को सर्बोपरि मानता है जिसका पालन हर नागरिक का कर्तव्य होता है ये सही है कि लोकतंत्र मे राजा का खिताब तो जनता के पास होता है मगर सत्ता संचालन का कार्य वैधानिक तौर चुने हुये जन प्रतिनिधि और पढ़े लिखे हमारे सेवक करते है मगर 72 बर्षो कि आजादी के बाद हालात यह है कि लगभग 80 करोड़ सस्ते राशन तो 50 करोड़ के लगभग स्वास्थ सेवा प्राप्त करने आर्थिक सहयोग के मोहताज है और करोड़ो लोग फ्री या सस्ते मकानो कि कतार मे है अब तो देश का लगभग करोड़ो की संख्या मे अन्नदाता भी नगद राहत की कतार मे है जिसमे उम्दा वैश्विक शिक्षा तो दूर की कोढ़ी हम हमारी नैसर्गिक मूल शिक्षा तक के मोहताज है क्योकि न तो हमारे पास ऐसे प्रशिक्षित शिक्षक है न ही वह संसाधन जो हमारी प्रतिभाओ को उभार उस मानव धन उसमे मौजूद विलक्षण संसाधन का उपयोग सर्बकल्याण मे कर सके अगर यो कहै कि आयनो के बाजार स्वार्थ के बड़े बड़े बाजार चल पढ़े है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी बैहतर हो कि हम स्वयं को पहचाने और स्वयं के सामर्थ पुरूषार्थ के बल एक कल्याणकारी राजा होने का प्रमाण प्रस्तुत करे जिसकी सौ फीसद जबाबदेही आज हम निभा भी रहै सिर्फ रक्षा उन राज पुरूषो से करना है जो चोर है और ब्यबस्था का, जनता का राजकोस या तो स्वयं पर लुटा रहै है या फिर राजस्व बसूली और वितरण का कार्य ठीक से नही कर पा रहै है और आम जीवन बैहाल हो सिसकने पर मजबूर हेै अगर हमने टेक्स मे देने बाले नोट ओर वोट की रक्षा करली तो कोई कारण नही जो हम मौजूद समृद्धि खुशहाॅली के मोहताज रह पाये आज के लिये यही समझने बाली बात होना चाहिए । 


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