मुखिया की मंशा पर मशवरे से मातहत परेशान
बजट की बैला पर मुफलिशी से हैरान
व्ही.एस. भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा
यू तो मशवरा लेने का प्रचलन आदिअनादी काल से चलता रहा है मगर तब मशविरे सर्बकल्याण धर्म रक्षा हेतु सत्ताये या सत्ता प्रमुख लिया करते थे मगर जब से हम श्रेष्ठ विद्या विज्ञान के वंशजो जाने अनजाने मे गुरू मेकाले की शिक्षा दीक्षा प्राप्त कर जीवन रक्षा, धर्म, सर्बकल्याण का ज्ञान विज्ञान हासिल किया है तब से आज तक हम अपने विधि विधान को त्याग उसे दफन कर सेवा कल्याण के रथ पर सबार स्वार्थ की ध्वजा पताखा लहरा सर्बकल्याण पर विजय हासिल करने संघर्ष मे जुटे है मुफलिसी मे ही सही धृतराष्ट्र बनी हमारी सत्ता सियासत पर निश्चित ही हमे गर्व करना चाहिए । क्योकि अब तो हम गूगल, डेटा गुरू की कृपा से अदृश्य होकर ही फोकट मे सलाह मशवरा बटोरने मे माहिर हो चुके है और चापलूसो के सहारे शूरवीर ।
बहरहाॅल मशविरा किसी गली गाॅब मोहल्ले गरीब बैरोजगार से नही बल्कि मुखिया ने हमारे पढ़े लिखे विद्यवान श्रीमानो से मांगा जा रहा है कि कंगाल खजाना कैसै भरे शासन की आय कैसै बढ़े फिलहाॅल तो माईबाप वीडियो कान्फ्रेन्स बी. सी. जानकारी बैठक जनसुनवाई पाई पाई को मोहताज बैचारे सत्ता के सियासी मंशूबो को पूरा करने दिन रात जुटे है अब ऐसे मे सत्ता श्रूति मे जुटे माईबाप आय बढ़ाने क्या मशविरा मुखिया को देते है ये तो आने बाला समय ही तय करेगा ।
मगर फिर भी सर्बकल्याण मे फोकट की सलाह देने मे हर्ज ही क्या ? कहते है जब विकेन्द्रिकृत ब्यवस्था मे विधि विरूध ब्यवस्था केन्द्रीकृत हो जाये और विकास सेवा कल्याण तथा प्राकृतिक संसाधनो का दोहन केन्द्रीकृत हो जाये तो फिर आय कैसै बढ़ेगी क्योकि ऐसे मे शासन को मिलने बाला आयकर जी एस टी उपकर तो सीधा केन्द्र के खजाने मे चला जायेगा और सत्ताओ का सारा निवेश कुछ ही लोगो के घरो मे पहुॅच जायेगा जब पैसा आम लोगो तक पहुॅचेगा ही नही तो बाजार कैसे चलेगे और स्थानीय सरकारो को राजस्व कहां से मिलेेगा क्योकि मौजूद ब्यवस्था मे सरकार उत्पादक उद्योग ही बढ़े निवेशक होते है जिनसे अर्थव्यवस्था चलती है जब सत्ता सेवा कल्याण विकास मे निवेश करती है तब करोड़ो लोगो को रोजगार मिलता है जब उत्पादक अपना उत्पादन बाजार मे लाता है तो उससे लोगो के रोजमर्रा की बस्तुये उपलव्ध होती है जिससे रोजगार के साथ ही अर्थ व्यवस्था भी चलती है तथा प्राकृतिक संसाधनो का दोहन भी रोजगार के साथ अर्थ व्यवस्था को मजबूती प्रदान कर शासकीय खजाने को भरने का कार्य करते है मगर सियासी मंसूबो ने न तो रोजगार की परबा की नही कंगाल होते खजाने को भरने की कोसिश परिणाम कि चहुॅ ओर कोहराम मचा है और लाखो करोड़ का कर्जा सर पर अब ऐसे मे कैसे आय बढ़ेगी और कंगाल खजाने पर ओर कितनो दिनो चलेगा सेवा कल्याण विकास देखने बाली बात होगी । जय स्वराज

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